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आतंक की आग

अफगानिस्तान पिछले कई सालों से लगातार अल कायदा और तालिबान के आतंक से जूझ रहा है।

Author June 1, 2017 5:06 AM
अफगानिस्तान में अभी 8,400 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। सांकेतिक फोटो (Source: Express Archive/file)

अफगानिस्तान पिछले कई सालों से लगातार अल कायदा और तालिबान के आतंक से जूझ रहा है। इस दौरान आतंकी हमलों पर काबू पाने या उनसे निपटने के मोर्चे पर तमाम कवायदों के बावजूद ऐसी घटनाओं में कोई कमी नहीं आ पा रही है। बुधवार को काबुल में हुए एक बड़े आतंकी हमले में अस्सी लोगों की मौत और साढ़े तीन सौ से अधिक के घायल होने की घटना ने एक बार फिर अफगानिस्तान में आतंकी समूहों के असर को रेखांकित किया है। इतने भयावह हमले से पैदा त्रासदी का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब तक ऐसे हमलों में अल कायदा का हाथ माना जाता रहा है। मगर ताजा हमले के बाद तालिबान ने इसमें अपनी भूमिका होने से इनकार किया है, जबकि इतने बड़े हमले के बाद अलग-अलग आतंकी समूहों के बीच उसका श्रेय लेने की होड़ मच जाती है। यानी अगर तालिबान की बात मान लें तो यह पिछले कुछ समय से अफगानिस्तान में आइएसआइएस के पसरते पांव की ओर संकेत करता है।

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गौरतलब है कि इसी साल मार्च में काबुल स्थित एक सैन्य अस्पताल में डॉक्टरों के वेश में आतंकवादियों ने हमला किया था। उसमें तीस से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। उस हमले की खुली जिम्मेदारी आइएस ने ली थी। यों भी, जब से आइएस ने वहां अपना असर बढ़ाना शुरू किया है, तब से अफगानिस्तान के सामने आतंकवाद की समस्या और ज्यादा जटिल हुई है। पिछले दो-तीन सालों से बम विस्फोट और भारी तादाद में मारे जा रहे लोग अब वहां की एक सामान्य तस्वीर होती जा रही है। लेकिन अब तक ऐसी कोई भी ठोस पहलकदमी नहीं हुई है, जिससे वहां के लोग अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो सकें। हालत यह है कि काबुल में अब आतंकी हमले बड़ी आसानी से अंजाम दिए जाने लगे हैं, जहां दुनिया के कई देशों के दूतावास स्थित हैं और उसे वहां का सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता है। सुरक्षा बलों की सख्त तैनाती के बावजूद वहां ऐसे हमले अक्सर होते रहते हैं। हालांकि यह भी सच है कि अगर आतंकवादी इसके लिए आत्मघाती दस्ते का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें रोकना कई बार मुश्किल हो जाता है।

हैरानी की बात यह है कि आइएसआइएस या तालिबान जैसे संगठन जो मजहबी आधार पर खुद को मुसलिम समुदाय का चेहरा बताते हैं, उन्हें रमजान के दिनों में भी ऐसे आतंक फैलाने और मासूम लोगों की हत्याएं करने में कोई संकोच नहीं होता। दरअसल, जो भी संगठन या गिरोह नफरत, खौफ या आतंक और निर्दोष लोगों की हत्याओं को अपना प्रभाव फैलाने का जरिया बनाता है, उसकी नजर में धर्म की कोई अहमियत नहीं होती। वह सिर्फ धर्म से जुड़ी संवेदनाओं का इस्तेमाल करता है। जाहिर है, इससे अंतिम तौर पर समाज और इंसानियत को नुकसान पहुंचता है। तालिबान या आइएसआइएस जैसे धर्म की लड़ाई लड़ने वाले तमाम संगठन जिन लोगों या समुदायों की आस्था और भावनाओं का शोषण करते हैं, उन्हें ही अपना शिकार बनाते हैं। सच यह है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले आतंकियों से किसी नैतिकता या संवेदना की उम्मीद करना बेमानी है। ऐसे कई सवालों के साए में ये सवाल तेजी से उभरने लगे हैं कि क्या तालिबान या आइएसआइएस को बढ़ावा देने वाली कोई और ताकत है! आतंकवाद से निपटने की रणनीति में आखिर वह कौन-सी खामी है, जिसके सामने दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें भी लाचार हैं।

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