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घाटी की फिक्र

शाह की यात्रा से एक दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि घाटी में पहले पत्थरबाजी बंद हो, फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हो।

Author April 30, 2017 11:30 PM
कश्मीर घाटी में यह अशांति बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से फैली हुई है।

जम्मू-कश्मीर में सरकार बनने के बाद पहली बार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कश्मीर की आधिकारिक यात्रा की है। वहां पहुंचते ही उन्होंने अपने पार्टी विधायकों को नसीहत दी कि वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के बजाय घाटी के लोगों से बातचीत करें, उनकी समस्याएं जानें और उनका समाधान निकालने का प्रयास करें। वे केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित न रहें, दूसरे इलाकों में भी जाएं। शाह की यात्रा से एक दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि घाटी में पहले पत्थरबाजी बंद हो, फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हो। मगर लगता नहीं कि भाजपा अध्यक्ष की इस यात्रा के पीछे मकसद सर्वोच्च न्यायालय की मंशा के अनुरूप घाटी में शांति बहाल करना है। उन्होंने विधायकों को सक्रिय होने की नसीहत देते हुए यह भी कहा कि अगले विधानसभा चुनाव में उनका मकसद चालीस सीटें लाना है। इसलिए इसके पीछे कुछ लोग स्वाभाविक ही दूसरा अर्थ निकाल रहे हैं। दरअसल, इन दिनों पीडीपी और भाजपा के रिश्ते सामान्य नहीं रह गए हैं। लोकसभा उपचुनावों में पत्थरबाजी के बाद पैदा हुए वहां के हालात को देखते हुए सबकी निगाहें केंद्र सरकार की तरफ लगी हुई हैं। पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी प्रधानमंत्री से अपील की कि घाटी के लोगों और अलगाववादी नेताओं से बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया जाना चाहिए। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद घाटी के हालात बेकाबू होने पर एक बार सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे जाने के बाद उस सिलसिले को आगे नहीं बढ़ाया जा सका। फिलहाल घाटी में जैसी स्थिति बन गई है, उसे देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार अब अधिक दिन नहीं टिक सकती। इसलिए भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह घाटी में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना चाहते हैं। मगर जिस तरह घाटी में लंबे समय से असंतोष का माहौल है, उसमें महज चुनाव जीतने के मकसद से भाजपा के लिए रणनीति तैयार करना कितना कारगर होगा, कहना मुश्किल है।

अब स्थिति यह है क वहां स्कूल के बच्चे, यहां तक कि हरदम हिजाब में रहने वाली बच्चियां भी सुरक्षाबलों पर पत्थर उछालने लगी हैं। अगर कहीं सेना किसी आतंकवादी को पकड़ने के लिए नागरिक ठिकानों की घेराबंदी करती है तो वहां के नागरिक पत्थरबाजी शुरू कर देते हैं। छिपी बात नहीं है कि इसके पीछे अलगाववादी और कट्टरपंथी नेताओं का हाथ है। वहां के युवा सहज ही उनके उकसावे पर हाथ में पत्थर उठा लेते हैं। जब तक सामान्य लोगों में विश्वास बहाली का प्रयास नहीं होगा, किसी सार्थक नतीजे की उम्मीद बेमानी होगी। हुर्रियत नेताओं की फितरत है कि वे कश्मीरी लोगों को भड़का कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में बाधा डालने का प्रयास करते हैं। यह भी छिपी बात नहीं है कि वे पाकिस्तान के इशारे पर घाटी में अशांति बनाए रखना चाहते हैं। मगर इस पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उनसे बातचीत जारी रख कर घाटी का माहौल सामान्य करने में मदद मिलती है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय घाटी में अमन के लिए हुए प्रयासों को नजीर के रूप में देखा जा सकता है। केवल बंदूक के बल पर बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। अगर भाजपा अध्यक्ष अपने विधायकों-कार्यकर्ताओं को आम लोगों में व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा करने के काम में लगाएं तो घाटी में बेहतर स्थिति और जनाधार मजबूत करने की सूरत बन सकती है।

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