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आफत में राहत

सर्वोच्च अदालत में दायर की गई याचिकाओं में रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने की मांग करते हुए उनके संकट को मानवीय नजरिए से देखने का अनुरोध किया गया है।

Author October 16, 2017 1:21 AM
एक बुजुर्ग महिला को नाव से उतारकर लाता एक युवक। (Photo Source: REUTERS)

सर्वोच्च न्यायालय ने रोहिंग्या मुसलमानों को देश से बाहर निकालने पर फिलहाल रोक लगा दी है। जाहिर है, यह केंद्र सरकार के लिए एक झटका है, जिसने अगस्त मेंराज्यों को एक परिपत्र भेज कर ‘अवैध प्रवासियों’ की पहचान करने और उन्हें देश से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था। हालांकि गृह मंत्रालय की तरफ से भेजे गए इस परिपत्र में रोहिंग्याओं का अलग से जिक्र नहीं था, पर संदर्भ और वक्त के चुनाव से समझा जा सकता है कि मुख्य रूप से वही निशाने पर थे। सर्वोच्च अदालत का स्थगन आदेश भाजपा के लिए भी झटका है जो रोहिंग्या शरणार्थियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बताते हुए उन्हें जल्दी से जल्दी यहां से भगाने की वकालत कर रही थी। लेकिन अदालत के आदेश का यह मतलब नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा उसकी नजर में कोई गौण प्रश्न है। दरअसल, उसके लिए कई और सवाल भी अहम हैं। सर्वोच्च अदालत में दायर की गई याचिकाओं में रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने की मांग करते हुए उनके संकट को मानवीय नजरिए से देखने का अनुरोध किया गया है। अदालत का पिछले हफ्ते का आदेश एक अंतरिम आदेश है, पर इस आदेश से और सुनवाई के दौरान की एक-दो टिप्पणियों से उसके रुख का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अदालत ने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा इस मामले को संकट में पड़े लोगों की सहायता के मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने की जरूरत है। साथ ही, यह वित्तीय तथा जनसांख्यिकीय प्रश्न भी है। अगर रोहिंग्या लोगों को यहां रहने दिया जाता है तो इसका वित्तीय बोझ कौन उठाएगा? आदर्श समाधान तो यह था कि म्यांमा इन्हें वापस लेने के लिए तैयार हो जाता और ये भी वहां लौटने को राजी हो जाते। पर म्यांमा की सेना ने जैसे जुल्म ढाए हैं उस अनुभव के चलते फिलहाल शायद ही कोई रोहिंग्या लौटना चाहेगा। अगर उन्हें जबर्दस्ती वापस भेजा जाएगा, तो यह संकट में पड़े लोगों को फिर से उत्पीड़न और अत्याचार सहन करने के लिए विवश करना होगा। इससे दुनिया में भारत की छवि पर आंच ही आएगी। फिर, एक व्यावहारिक सवाल यह भी है कि म्यांमा की फौज अगर शरणार्थियों को वापस घुसने नहीं देगी, तो उन्हें वापस कैसे भेजा जा सकेगा? यह भी गौरतलब है कि म्यांमा ने सिर्फ रोहिंग्या लोगों पर नहीं, बल्कि वहां की कई जनजातियों पर भी, जो मुसलिम नहीं हैं, इसी तरह के जुल्म ढाए हैं।

इसलिए पहला तकाजा तो यह है कि इस मामले को किसी धर्म-विशेष से जोड़ कर या सांप्रदायिक नजरिए से न देखा जाए। जहां तक सुरक्षा संबंधी चिंता है, सर्वोच्च अदालत ने सरकार से दो टूक कहा है कि जहां भी कुछ गलत दिखे, फौरन कार्रवाई करें, पर अभी रोहिंग्या लोगों को यहां से निकालने का कोई कदम न उठाएं। दूसरी तरफ, अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकील से कहा कि अगर इस बीच में उन पर कोई आफत आए, तो अगली सुनवाई से पहले भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। कोई चालीस हजार रोहिंग्या पनाह की आस में भारत में मौजूद हैं, जो मुख्य रूप से जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर में रह रहे हैं। उनमें महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, बीमार लोग भी हैं। जैसा कि अदालत ने खुद कहा है, उसे हर कोण से विचार करना है। संतुलित नजरिए का यही तकाजा है।

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