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संपादकीय: सुनवाई से आस

मुसलिम समुदाय में हलाला या निकाह हलाला की रस्म के तहत, जिस व्यक्ति ने तलाक दिया है उसी से दोबारा शादी करने के लिए महिला को पहले किसी अन्य पुरुष से शादी करनी होती है और फिर तलाक लेना होता है, उसके बाद ही दोबारा पूर्व पति से शादी हो सकती है।

Author Published on: March 28, 2018 4:16 AM
सुप्रीम कोर्ट (photo source – Indian express)

तलाक-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक मामले में अपने फैसले के सात महीने बाद सर्वोच्च न्यायालय अब बहुविवाह और निकाह हलाला की संवैधानिकता पर सुनवाई करने को राजी हो गया है, तो यह पिछले फैसले की ही तार्किक कड़ी है। पिछले साल अगस्त में दिए अपने फैसले में संविधान पीठ ने तीन तलाक प्रथा को गैर-कानूनी ठहराया था। अब एक बार फिर मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाओं पर सुनवाई संविधान पीठ करेगा। इन याचिकाओं में मांग की गई है कि मुसलिम पर्सनल लॉ (शरीअत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करने वाला करार दिया जाए। मुसलिमों से संबंधित निजी कानून मुसलिम पुरुष को चार स्त्रियों तक से विवाह करने की अनुमति देता है। ऐसी इजाजत स्त्री की गरिमा के खिलाफ है, उसे वस्तु या इंसान से कमतर प्राणी में और पुरुष को उसके मालिक के रूप में बदल देती है। यह संवैधानिक मूल्यों और संवैधानिक प्रावधानों के भी खिलाफ है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, वहीं अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार की बात कही गई है। ऐसे ही प्रावधानों के खिलाफ होने के कारण जिस तरह तलाक-ए-बिद््दत पर हमेशा सवाल उठते रहे, उसी तरह एक से अधिक शादी करने की इजाजत और निकाह हलाला पर भी उठते रहे हैं।

मुसलिम समुदाय में हलाला या निकाह हलाला की रस्म के तहत, जिस व्यक्ति ने तलाक दिया है उसी से दोबारा शादी करने के लिए महिला को पहले किसी अन्य पुरुष से शादी करनी होती है और फिर तलाक लेना होता है, उसके बाद ही दोबारा पूर्व पति से शादी हो सकती है। शरीअत में भले यह एक तरह की ‘सजा’ हो, लेकिन क्या पूर्व पत्नी की तरह पूर्व पति के लिए भी ऐसी शर्त रखी गई है? और फिर जब अलग हो चुके दो बालिग फिर से जुड़ना चाहते हैं, तो उनकी मर्जी और निर्णय काफी होना चाहिए। उन्हें किसी सजा से क्यों गुजरना पड़े? और ‘सजा’ के रूप में औरत के लिए ऐसी शर्त, जो उसके शरीर पर उसका अधिकार नहीं रहने देती! जाहिर है, ऐसी प्रथाओं को निजी कानून की आड़ में नहीं चलने दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने मुता निकाह और मिस्यार निकाह को भी सुनवाई के योग्य माना है, क्योंकि इनके तहत बस एक निश्चित अवधि के लिए शादी का करार होता है। क्या इसे शादी कहा जा सकता है? तलाक-ए-बिद््दत पर बहस के दौरान ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मामले को न्यायिक समीक्षा के परे कहा था। उसकी निगाह में ऐसे मामले में अदालत में सुनवाई होना धार्मिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप था। यह अलग बात है कि अलग-थलग पड़ जाने के कारण बोर्ड ने बाद में अपने सुर नरम कर लिए थे। हो सकता बोर्ड और कुछ दूसरी संस्थाएं एक बार फिर वैसी ही दलील पेश करें।

यह सही है कि हमारे संविधान ने धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दे रखी है, पर यह असीमित नहीं है। धार्मिक स्वायत्तता उसी हद तक मान्य हो सकती है जब तक वह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक नागरिक अधिकारों के आड़े न आए। सती प्रथा, नरबलि और जल्लीकट्टू जैसी प्रथाओं के मामलों में भी सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर चुका है। इसलिए बहुविवाह, निकाह हलाला, मुता निकाह और मिस्यार निकाह पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने के उसके फैसले को समुदाय-विशेष की धार्मिक आजादी और परंपरा या रिवाज में बेजा दखलंदाजी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे समानता तथा न्याय के लिए मुसलिम स्त्रियों के संघर्ष के नए मुकाम के रूप में देखना ही सही नजरिया होगा।

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