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संपादकीय: दागी विस्तार

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी मंत्रिपरिषद का आठवीं बार विस्तार किया है।
Author September 27, 2016 05:40 am
उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव। (पीटीआई फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी मंत्रिपरिषद का आठवीं बार विस्तार किया है। सोमवार को सात कैबिनेट मंत्रियों और तीन राज्यमंत्रियों को शपथ दिलाई गई। आगामी विधानसभा चुनाव सेकुछ महीने पहले किए विस्तार में जाहिर है कि जातिगत और दूसरे भी किस्म के वोट बैंक को ध्यान में रखा गया है। लेकिन सबसे चौंकाऊ निर्णय रहा भ्रष्टाचार के आरोप में दो हफ्ते पहले मंत्री-पद से बर्खास्त किए शख्स की मंत्रिमंडल में वापसी। साथ में दो और बर्खास्त मंत्रियों की बहाली करके ब्राह्मण समुदाय को साधने की कोशिश की गई है तो तीन मुसलिम चेहरों को सामने लाकर अल्पसंख्यकों को रिझाने की। मंत्रिपरिषद के इस विस्तार के तकनीकी पहलुओं और चुनावी गुणाभाग को हटा कर देखें तो सबसे ज्यादा निगाह किसी बात परजाती है तो वह है भ्रष्टाचार के प्रति उत्तर प्रदेश सरकार का नतमस्तक होना। यों मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त न करने (जीरो टालरेंस) की अपनी वचनबद्धता जाहिर कर चुके हैं। लेकिन यह खोखली डींग ही साबित हुई है।

हाल में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- मेरे ऊपर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है। कोई मुझे बताए कि मैंने किसी से भी एक पैसा लिया हो। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन तीन मंत्रियों को उन्होंने खुद अपनी कलम से बर्खास्त किया था, उन्हीं को मंत्रिपरिषद में वापस लेने को वे राजी हो गए। क्या यही भ्रष्टाचार के प्रति उनका ‘जीरो टालरेंस’ है? कहा जा रहा है कि उन्हें जहर का यह घूंट पीने के लिए उनके पिता और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और चाचा-कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने मजबूर किया। इस मंत्रिपरिषद-विस्तार का नफा-नुकसान क्या होगा, इसका हिसाब तो आगामी चुनाव में होगा। लेकिन फिलहाल जनता के बीच जो संदेश गया है वह जगहंसाई होने और एक संभावनाशील नेतृत्व के विचलन का ही है।

पिछले विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने भरोसा दिलाया था कि इस बार सत्ता में आने का मौका मिला तो समाजवादी पार्टी पिछली गलतियां नहीं दोहराएगी। पर पार्टी फिर से वही कर रही है, दागियों को गले लगाना। जिन्हें नब्बे के दशक की राजनीति की याद है, उन्हें पता होगा कि उन दिनों एक नारा बहुत तेजी से आबोहवा में उछला हुआ था कि लोकराज, लोकलाज के बगैर नहीं चलता। यह उन दिनों की बात है, जब वीपी सिंह भ्रष्टाचार को मुद््दा बना कर कांग्रेस को किनारे करने की कोशिश में लगे हुए थे। इस नारे के सबसे बड़े पैरोकार देवीलाल थे। वे वीपी सिंह के साथ उपप्रधानमंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव भी तब उस भ्रष्टाचार-विरोधी लड़ाई में शामिल थे। वही मुलायम सिंह आज उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री के पक्ष में खड़े हैं। यह समाजवादी राजनीति के पतन की कैसी करुण-कहानी है कि लोहिया के ज्यादातर शिष्य आज परिवारवाद और भ्रष्टाचार के दलदल में खड़े हुए हैं। जबकि लोहिया की पूरी राजनीति इन्हीं दोनों बुराइयों से निपटने की कुंजी थी। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण केंद्रीय राजनीति में खासा असर रखता है। इतने बड़े राज्य के चुनाव में भ्रष्टाचार एक अहम मुद््दा नहीं बनेगा, यह मानना भूल होगी। विचित्र है कि जब राज्य में चुनावी गहमागहमी शुरू हो चुकी है तब भी सपा नेतृत्व को लोकलाज की चिंता नहीं है।

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