JANSATTA EDITORIAL ABOUT SHOOTING AT FARMER IN MP - Jansatta
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चिंता और चेतावनी

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में एक हफ्ते से आंदोलन कर रहे किसानों के ऊपर मंगलवार को हुई पुलिस फायरिंग में आधा दर्जन किसानों की मौत हो गई और आठ किसान गंभीर रूप से घायल हो गए।

Author June 8, 2017 5:07 AM
मंदसौर में हिंसाग्रस्‍त क्षेत्रों की तस्‍वीरें। (Source: PTI, 06 June 2017)

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में एक हफ्ते से आंदोलन कर रहे किसानों के ऊपर मंगलवार को हुई पुलिस फायरिंग में आधा दर्जन किसानों की मौत हो गई और आठ किसान गंभीर रूप से घायल हो गए। ये आंदोलनकारी अपनी फसलों के वाजिब दाम देने और कर्जमाफी वगैरह की मांग कर रहे थे। घटना की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार शाम अपने वरिष्ठ मंत्रियों की आपात बैठक बुलाई। गौरतलब है कि देश के कई राज्यों में किसान कर्जमाफी की मांग कर रहे हैं। तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य में भी किसान आंदोलित हैं। मध्यप्रदेश में किसान कई मांगों को लेकर पहली जून से ही मंदसौर और उसके आसपास आंदोलन कर रहे थे। यह सरकार की अदूरदर्शिता ही कही जाएगी कि उसने समय रहते किसानों से बातचीत करने की कोई कारगर पहल नहीं की, जिससे उनके बीच आक्रोश बढ़ता गया। मंगलवार को मंदसौर-नीमच रोड पर पीपल्या थानाक्षेत्र में किसानों का भारी जमावड़ा हो गया। वे शांति मार्च निकाल रहे थे, लेकिन वहां मौजूद सुरक्षा बलों को देखते ही भड़क गए। पहले तो किसानों ने कई वाहनों को आग लगा दी, जिससे अफरातफरी मची। उन्हें काबू करने के लिए सुरक्षा बलों ने गोली चलाई, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई और आठ किसान गंभीर रूप से घायल हो गए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी मृतकों के परिजन को एक-एक करोड़ रुपए और घायलों को दस-दस लाख रुपए देने तथा मुफ्त इलाज कराने की घोषणा की है। साथ ही घटना की न्यायिक जांच के आदेश भी दिए हैं।

इस घटना का चिंताजनक पहलू यह रहा कि प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह शुरू में कहते रहे कि पुलिस की तरफ से कोई गोली नहीं चलाई गई, बल्कि भीड़ में अराजक तत्त्वों की गोली से किसान मारे गए। यहां तक कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कांग्रेसी नेताओं पर घटना को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया। लेकिन, शाम होने तक जब स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई तब कहीं जाकर मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच कराने और मुआवजे का एलान किया। फिर, गृहमंत्री ने भी अपने बयान में तब्दीली की। सवाल है कि ऐसी दर्दनाक घटनाओं पर क्या दोषारोपण और बयानबाजी करनी चाहिए ? विरोधाभास यह भी कि जिलाधिकारी का कहना है कि प्रशासन की ओर से गोली चलाने का कोई आदेश नहीं दिया गया था। फिर, किस हालत में गोली चलाई गई, यह जांच के बाद ही पता चलेगा। मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि जांच में दोषी मिले व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। कांग्रेस ने कहा है कि भाजपा सरकार किसानों के साथ ‘युद्ध’ जैसी स्थिति में है।

वास्तव में पूरे देश में किसानों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। महाराष्ट्र, पंजाब, आंध्रप्रदेश समेत तमाम राज्यों में किसान लंबे समय से आत्महत्या कर रहे हैं। कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा जैसी प्राकृतिक आपदा तो कहीं सरकारी नीतियों की वजह से देश के किसान तबाही के कगार पर पहुंच चुके हैं। सीमांत और मझोले किसानों की स्थिति यह हो गई है कि उन्हें खेती से अपनी लागत वसूलने में भी मुश्किल हो रही है। ऐसे में किसानों के सामने अपनी सरकारों के आगे हाथ फैलाने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है। किसानों का यह भी कहना है कि जब कारपोरेट घरानों की कर्जमाफी का सवाल आता है तो सरकार जरा भी नहीं हिचकती, लेकिन जैसे ही किसानों की बात आती है, सरकारें लाठी-गोली पर उतर आती हैं। प्रधानमंत्री की बुलाई आपात बैठक में क्या फैसला होता है, यह देखने की बात है। मंदसौर की घटना गंभीर चिंता के साथ ही एक बड़ी चेतावनी भी है।

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