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संपादकीयः जानलेवा लापरवाही

ऐसा लगता है कि देश के स्कूली बच्चों की पढ़ाई-लिखाई जान के जोखिम के बीच हो रही है।

Author Published on: April 28, 2018 3:15 AM
प्रतीकात्मक चित्र

ऐसा लगता है कि देश के स्कूली बच्चों की पढ़ाई-लिखाई जान के जोखिम के बीच हो रही है। जिस दिन उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में स्कूली बच्चों को ले जा रहा वाहन मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर एक ट्रेन की चपेट में आ गया और तेरह बच्चों की मौत हो गई, उसी दिन दिल्ली के केशवपुरम इलाके में भी इसी से मिलता-जुलता एक हादसा हुआ। फर्क यह था कि बच्चों को ले जा रहे इस वाहन की टक्कर एक टैंकर से हो गई, जिसमें एक सात साल की बच्ची की जान चली गई और सत्रह बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों ही हादसों में यह खबर प्रमुखता से आई कि ड्राइवर ईयरफोन लगाए लापरवाही से गाड़ी चला रहा था। दिल्ली की घटना में बच्चों को ले जा रहा वाहन सोलह साल पुराना था और पहले ही जर्जर हालत में था। इसके बावजूद उसमें अठारह बच्चों को भर कर ले जाया जा रहा था। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि यह वाहन किसी टैंकर से टकराने के पहले ही किस तरह के खतरे को अपने साथ लेकर चल रहा था। खुद ही पलट जाने या किसी दूसरी वजह से भी उसके दुर्घटनाग्रस्त होने आशंका लगातार बनी हुई थी।

हादसे के बाद ज्यादा बच्चों को ढोने से लेकर लापरवाही से वाहन चलाने जैसी जो भी वजहें सामने आ रही हैं, वे सब नई नहीं थीं। इन वाहनों की भीतरी बनावट में बदलाव करके जबरन जगह बनाई जाती है और उसमें क्षमता के मुकाबले तीन-चार गुना लोगों को जोखिम भरे हालात में ढोया जाता है। ऐसे में किसी भी समय हादसा होने का खतरा बना रहता है। सड़क पर बहुत सामान्य बातों पर भी निगरानी रखने का दावा करने वाली पुलिस की नजर में यह खतरनाक गतिविधि क्यों नहीं आई? एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली में लगभग दस हजार अवैध वाहन चल रहे हैं और एक लाख से ज्यादा विद्यार्थी इनसे अपने स्कूल आते-जाते हैं। बहुत कम ऐसे स्कूली वाहन हैं, जिनमें इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी शर्तें या मानक पूरे किए जाते हैं। दरअसल, नियम-कायदों पर अमल को लेकर संबंधित महकमे तभी सक्रिय होते हैं, जब कोई हादसा सामने आ जाता है। इससे पहले इस पर नजर रखना जरूरी नहीं समझा जाता कि स्कूली बसों में अदालत की ओर से तय मानकों से लेकर परिवहन विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है या नहीं।

विडंबना यह भी है कि आवाजाही के जोखिम से इतर बच्चों के लिए स्कूल का परिसर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा है। पिछले साल गुरुग्राम में रेयान इंटरनेशन स्कूल में एक बच्चे की हत्या वहीं पढ़ने वाले एक छात्र ने कर दी। इसके अलावा, बच्चों पर जानलेवा हमले से लेकर यौन शोषण तक की घटनाएं सामने आती रहती हैं। किसी खास मामले के सुर्खियों में आ जाने के बाद दिखावे की सक्रियता के तहत ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने की घोषणा के साथ कुछ कदम उठाए जाते हैं। मगर थोड़े समय के बाद फिर कोई ऐसा हादसा सामने आ जाता है, जिसमें मुख्य वजह लापरवाही होती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि स्कूलों के लिए जोखिमरहित सफर और सुरक्षित माहौल में पढ़ाई बच्चों का अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना स्कूल प्रबंधन से लेकर संबंधित सरकारी महकमों की जिम्मेदारी।

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