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अखिलेश की सपा

आखिरकार पार्टी पर हक को लेकर सपा में चल रहे कानूनी झगड़े का पटाक्षेप हो गया।

Author January 18, 2017 4:19 AM
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के साथ बात करते हुए। (Source: Agencies)

आखिरकार पार्टी पर हक को लेकर सपा में चल रहे कानूनी झगड़े का पटाक्षेप हो गया। निर्वाचन आयोग ने अखिलेश यादव के पक्ष में फैसला सुनाया। यानी अब पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अखिलेश यादव और उनकी अगुआई वाले धड़े का अधिकार होगा। आयोग का यह फैसला बिल्कुल वाजिब है। आयोग ने इस मामले में पार्टी-विभाजन के पूर्व के उदाहरणों को भी सामने रखा और दोनों तरफ के तथ्यों को भी। हर लिहाज से यह जाहिर था कि अखिलेश की दावेदारी एकदम पुख्ता है। संगठन और विधायक दल, दोनों में अखिलेश को हासिल समर्थन के आगे मुलायम सिंह कहीं नहीं टिक सके। इस झगड़े और इसकी परिणति से जाहिर है कि सामने दीवार पर जो लिखा था, मुलायम सिंह उसे नहीं पढ़ पा रहे थे। उनकी जिद और उनका अहं उन्हें ले डूबा। जो पार्टी उन्होंने बनाई और खड़ी की थी, उसमें वे अलग-थलग पड़ गए, क्योंकि वे यह मोटी-सी बात स्वीकार नहीं कर पाए कि सपा उत्तर-प्रदेश केंद्रित है, और अखिलेश के मुख्यमंत्री बनते ही पार्टी का चेहरा वही हो गए थे। उनकी साख, लोकप्रियता और पांच साल के कामकाज के बल पर ही सपा को चुनाव में जाना है। और दिलचस्प यह कि सपा के विधायक व कार्यकर्ता तो अखिलेश को लेकर उत्साहित नजर आ रहे थे, परेशानी थी तो अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव और चाचा शिवपाल सिंह यादव को।

इस सारे झगड़े का सबसे विचित्र पहलू यह रहा कि जब देश के बहुत-से नेता बेटे-बेटियों को आगे बढ़ाने में लगे हैं, मुलायम सिंह और अखिलेश यादव आमने-सामने खड़े थे। इसका अर्थ यह नहीं कि सपा परिवारवाद से अछूती है; अगर वैसा होता तो अखिलेश मुख्यमंत्री की कुर्सी तक शायद ही पहुंच पाते। सच यह है कि यथार्थ को समझ या स्वीकार न कर पाने और पार्टी में केवल खुद को निर्णायक मानने की मुलायम सिंह की आदत व जिद ने उन्हें इस लायक भी नहीं छोड़ा कि वे अपना कद व आत्म-सम्मान बचाए रख सकें। उनकी जगहंसाई तो हुई ही, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद भी चला गया। अगर सपा का लगभग समान बंटवारा हुआ होता, तो वे चुनाव में अखिलेश धड़े को सबक सिखाने का नकारात्मक खेल खेल सकते थे। पर उनकी इतनी भी ताकत नहीं बची है। बहरहाल, सपा में महीनों से चल रही तकरार टिकट बंटवारे को लेकर निर्णायक मुकाम तक पहुंची। दागियों को टिकट दिए जाने पर अखिलेश को घोर एतराज था। इसलिए अब उम्मीद की जाएगी कि उनके नेतृत्व में सपा बदली हुई दिखे और स्वच्छ छवि के लोगों को ही उम्मीदवार बनाया जाए। अगर अखिलेश इस उम्मीद पर खरे उतरेंगे तो उनकी साख में इजाफा होगा, वरना उनके प्रति अभी दिख रहा उत्साह ठंडा भी पड़ जा सकता है।

सपा को वैसे भी अखिलेश की ही छवि के सहारे और उन्हीं की अगुआई में चुनाव लड़ना था, पर निर्वाचन आयोग के फैसले के बाद कुछ नए समीकरण भी बन सकते हैं। कांग्रेस ने सपा से गठजोड़ का इरादा जताया है, तो अखिलेश के सेनापति रामगोपाल यादव ने भी उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया जताई है। अगर सपा और कांग्रेस का गठजोड़ हो गया, और इसमें अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल भी जुड़ गया, तो यह उत्तर प्रदेश में एक ताकतवर गठबंधन साबित हो सकता है। विडंबना यह है कि सपा की भीतरी लड़ाई में भाजपा और बसपा, दोनों को अपने लिए फायदा दिख रहा था। लेकिन अब फायदे की उम्मीद के बजाय दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें देखी जा सकती हैं।

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