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मौत का सफर

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में बस और ट्रक की आमने-सामने की भिड़ंत में चौबीस यात्रियों की जल कर मौत हो गई और तेरह घायल हो गए।

Author June 7, 2017 7:41 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर।

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में बस और ट्रक की आमने-सामने की भिड़ंत में चौबीस यात्रियों की जल कर मौत हो गई और तेरह घायल हो गए। हमारा देश सड़क हादसों में दुनिया में अव्वल है और यह हादसा इसी कड़वी हकीकत की याद दिलाता है। गोंडा डिपो की यह बस दिल्ली से यात्रियों को लेकर जा रही थी। घटना रात एक बजे हुई, जब रोडवेज बस का चालक अपनी पटरी छोड़ कर दूसरी पटरी पर चला गया और लखनऊ की तरफ से आ रहे ट्रक से भीषण भिड़ंत हुई। टक्कर के कारण बस की डीजल टंकी में आग लग गई और देखते ही देखते पूरी बस धू-धू कर जल उठी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुआवजे के साथ ही घटना की जांच के आदेश भी दिए हैं। मौके पर तीन मंत्री भी भेजे गए। प्रधानमंत्री ने भी घटना पर दुख जताया है। मगर सवाल यह है कि चालक दूसरी पटरी पर गया क्यों? स्थानीय अधिकारी कह रहे हैं कि चालक भ्रमवश दूसरी साइड चला गया। यह नहीं हो सकता क्योंकि जिस राष्ट्रीय राजमार्ग पर हादसा हुआ है, उसके बीच में हरित पट्टी बनी हुई है और यातायात भी एकतरफा है। आने की पटरी अलग है और जाने की अलग। बचे हुए लोगों ने बताया कि बस का आपातकालीन द्वार जाम था। अगर यह दरवाजा खुल जाता तो शायदकई लोग बच जाते।

उत्तर प्रदेश की रोडवेज बसों में पहले आगे और पीछे दरवाजे होते थे, लेकिन नई डिजाइन के तहत अब केवल बीच में एक दरवाजा होता है। जो लोग दरवाजे के आसपास थे, वे तो किसी तरह गिरते-पड़ते बाहर आने में कामयाब हो गए। मगर जो फंस गए, उन्हें निकलने का मौका नहीं मिल सका। इस राज्य की बसें अपनी बदहाली और चालकों की लापरवाही के लिए बदनाम हैं। लंबी दूरी की बसों की हालत यह है कि प्राथमिक चिकित्सा के डिब्बे अमूमन खाली ही रहते हैं। कितनी बसों में तो इन डिब्बों को बरसों से खोला तक नहीं गया और वे जंग खाकर बेकार हो गए हैं। यही हाल आपातकालीन दरवाजों का है। न उनकी साफ-सफाई होती है और न ही उनका लॉक वगैरह कभी जांचा जाता है। स्टेशनों और कार्यशालाओं की गंदगी और बदहाली भी से किसी छिपी नहीं है।

पिछले कुछ सालों से इस विभाग में एक नई बीमारी लगी है, वह है सड़क के किनारे बने ढाबों पर चालकों-परिचालकों का मनमाने तौर पर बसों को रोक कर खाना खाना। इन ढाबों पर चालकों-परिचालकों को मुफ्त में खाना खिलाया जाता है, बदले में यात्रियों की जेबें ढीली की जाती हैं। यह एक नया गोरखधंधा है, जो लगातार बढ़ता ही जा रहा है। खाने के लालच में अक्सर चालक बसों को उलटी साइड में स्थित ढाबों पर ले जाने में नहीं हिचकते। कई बार तो वे कई किलोमीटर तक उलटी दिशा में चलते रहते हैं, जब तक कि कोई कट न मिल जाए अपनी साइड में आने के लिए। इस वजह से भी हादसे होते रहते हैं। हो न हो, इस मामले में भी ऐसा रहा हो। आंकड़े बताते हैं भारत में सड़क हादसों के पीछे अठहत्तर प्रतिशत मामले चालकों की गलती के होते हैं। तेज रफ्तार और नशाखोरी भी दुर्घटना की बड़ी वजहों में है। पर जैसा कि गोंडा के इस हादसे से जाहिर है, परिवहन तंत्र की अपनी खामियां भी हादसों के लिए कम जिम्मेवार नहीं हैं। इस सिलसिले पर रोक कब लगेगी?

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