ताज़ा खबर
 

फैसले की आस

देश के सुप्रीम कोर्ट का ध्यान मंगलवार को इस ओर तब गया, जब मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ आधार अधिनियम की वैधानिकता पर सुनवाई कर रही थी।
Author July 20, 2017 04:31 am
नाबालिग से बलात्कार के दोषियों को सजा के लिए पीड़ित से जिरह जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट। (फाइल फोटो)

निजता मौलिक अधिकार है या नहीं, इस सवाल का जवाब जल्द ही मिल जाएगा। देश के सुप्रीम कोर्ट का ध्यान मंगलवार को इस ओर तब गया, जब मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ आधार अधिनियम की वैधानिकता पर सुनवाई कर रही थी। अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या यह अधिनियम किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है? भारत सरकार की ओर से आधार कार्ड को अनिवार्य किए जाने के बाद अवकाशप्राप्त न्यायाधीश पुत्तास्वामी समेत तमाम लोगों ने शीर्ष अदालत में याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाओं में कहा गया है कि आधार के लिए बायोमीट्रिक पहचान एकत्र किया जाना और सभी चीजों को आधार से जोड़ा जाना नागरिक की निजता के मौलिक अधिकार का हनन है। ये याचिकाएं 2015 में सुनवाई के लिए बड़ी पीठ के पास भेजी गई थीं। तब तत्कालीन एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत से कहा था कि इस मामले में पहले जो फैसले सुनाए गए हैं, उनमें भिन्नता है। उन्होंने कहा था कि इस मुद्दे को हल करना होगा कि निजता का अधिकार मौलिक है या नहीं। गौरतलब है कि पिछली नौ जून को सुप्रीम कोर्ट की ही एक खंडपीठ ने केंद्र सरकार के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें आधार नंबर को आयकर रिटर्न के साथ जोड़ने को अनिवार्य किया गया था।

सुनवाई के दौरान अदालत ने भी माना कि इस मामले में सबसे पहले यह तय होना जरूरी है कि संविधान में निजता को मौलिक अधिकार माना गया है या नहीं? मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी थी, ‘पहले इसे तय करने की जरूरत है। नहीं तो, हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे।’ पीठ ने इस मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने के भी लिए कहा ही है। अनुमान है कि अगले हफ्ते तक फैसला आ जाएगा। संविधान पीठ की अध्यक्षता भी मुख्य न्यायाधीश करेंगे, जिसमें न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर आदि शामिल होंगे। नौ सदस्यीय संविधान पीठ यह भी देखेगी कि संविधान में परिभाषित मौलिक अधिकारों में निजता का अधिकार शामिल है या नहीं।

यह पीठ सुप्रीम कोर्ट के दो पुराने फैसलों की संवैधानिकता पर भी विचार करेगी, जिनमें निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माने जाने की व्यवस्था दी गई थी। इनमें एक फैसला 1954 में आठ जजों की खंडपीठ ने एमपी शर्मा व अन्य बनाम सतीश चंद्र और दूसरा फैसला 1962 में छह जजों की खंडपीठ ने खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दिया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओंं ने कहा कि छोटी पीठों ने अपने कई मामलों में निजता को मौलिक अधिकार माना है। 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत सरकार के मामले में भी सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया था। ऐसे में निजता का अधिकार भी अनुच्छेद-21 के तहत मौलिक अधिकार माना जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बड़ी पीठों ने भले ही इसे मौलिक अधिकार नहीं माना हो, लेकिन छोटी पीठों ने इसे मौलिक अधिकार माना है। संविधान पीठ के गठन से इस विवादास्पद मुद्दे पर उचित फैसला आने की आस बंधी है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.