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विरोध का तरीका

इस पर भाजपा के कुछ नेताओं, क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और फिल्म अभिनेता रणदीप हुड्डा ने उसका मखौल उड़ाते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि वह छात्रा किन्हीं और के इशारों पर विरोध कर रही है।

Author February 28, 2017 5:30 AM
दिल्ली विश्वविद्यालय के उतरी परिसर में तनाव पसरा है। रामजस कालेज बंद रहा। वामपंथी छात्र संगठनों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के खिलाफ प्रदर्शन किया।(Source: Ananya Vajpeyi/Facebook)

किसी मसले पर लोगों में मतभेद हो सकता है, पर जिस तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज की घटना पर कुछ लोग अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं, उसे किसी भी रूप में लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। छात्र संगठनों के वाम और दक्षिण धड़े के बीच हिंसक झड़प के बाद देश भर के विद्यार्थियों में रोष है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों ने अपना विरोध जाहिर करने के लिए जिस तरह हिंसा का रास्ता अपनाया उसकी चौतरफा निंदा हो रही है। इसी क्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने फेसबुक पर परिषद की निंदा की, जिसे लेकर निहायत अश्लील और धमकी भरे संदेश आने लगे। फिर उस छात्रा ने प्रतिक्रिया में कहा कि उसे अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए प्रमाण की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके पिता देश की रक्षा करते हुए मारे गए। इस पर भाजपा के कुछ नेताओं, क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग और फिल्म अभिनेता रणदीप हुड्डा ने उसका मखौल उड़ाते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि वह छात्रा किन्हीं और के इशारों पर विरोध कर रही है।

यह सब कुछ जिस भाषा में और जिस तरीके से हो रहा है, वह किसी स्वस्थ और जिम्मेदार समाज की निशानी नहीं कहा जा सकता। छिपी बात नहीं है कि पिछले कुछ दशक से छात्र राजनीति मुख्यधारा की राजनीति से संचालित-पोषित होती आ रही है। इस तरह परिसरों में वैचारिक असहिष्णुता का माहौल बना है। उनमें हिंसक झड़पें आम हो चली हैं। यही वजह है कि छात्र राजनीति में स्वस्थ परंपरा विकसित करने पर काफी समय से जोर दिया जा रहा है। मगर जब भी विद्यार्थियों में ऐसी हिंसक भिडंत की कोई घटना होती है, मुख्यधारा के राजनीतिक दल अपने-अपने आनुषंगिक छात्र संगठनों के बचाव में उतर आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की घटना के बाद भी वही हो रहा है। मगर पिछले कुछ सालों में जिस तरह देशभक्ति के नाम पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उग्र तेवर अख्तियार करता देखा जा रहा है और उसके बचाव में लोकतांत्रिक मर्यादा की परवाह किए बगैर भारतीय जनता पार्टी और उसके आनुषंगिक संगठनों के लोग बयान देते रहते हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ।

उस छात्रा के विरोध पर समाज, राजनीति, खेल और सिनेमा के कुछ लोगों के मैदान में उतर आने और भाषा की शालीनता का भी खयाल न रखने से मामले की हकीकत पर परदा नहीं डाला जा सकता, बेशक लोकतांत्रिक मर्यादा भंग हो रही है। समाज के जिम्मेदार नागरिक और खासतौर पर जानी-मानी हस्ती होने के नाते वीरेंद्र सहवाग और रणदीप हुड्डा जैसे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि ऐसे मसलों पर तार्किक बयान दें, पर उन्होंने एक गंभीर मसले को हल्के में लेने की कोशिश की। मसला यह है कि आखिर देशभक्ति के नाम पर किन बातों की छूट ली जा सकती है, राष्ट्रवाद के नाम पर किसी को अपनी बात कहने से रोक देना कहां तक उचित है। शील, मर्यादा और अनुशासन का घोष करने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने परिसर में अभिव्यक्ति की आजादी को जगह न देते हुए हिंसक बर्ताव किया, उस पर कोई बात करने के बजाय उसका विरोध करने वाली छात्रा पर अश्लील टिप्पणियां करना और उसकी मंशा को ही संदेह के घेरे में ला देना भला कहां की नैतिकता है। विचित्र है कि देशभक्ति के नाम पर बार-बार सेना को महिमामंडित करने वाले दल के नेता एक शहीद की बेटी के इरादे को प्रश्नांकित कर रहे हैं

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