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सफर में

बीते शुक्रवार को संसद में पेश की गई यह रिपोर्ट बताती है कि रेलवे खानपान के संबंध में यह प्रावधान है कि वस्तुएं निर्धारित दरों पर बेची जाएंगी, प्रत्येक वस्तु का मूल्य रेल प्रशासन तय करेगा, यात्रियों से अधिक कीमत नहीं ली जाएगी।

Author July 24, 2017 04:47 am
प्रतीकात्मक फोटो। (फाइल)

भारत में रेलवे सबसे बड़ी परिवहन सेवा है, सफर और माल ढुलाई दोनों के लिहाज से। रोजाना करोड़ों लोग किसी न किसी दूरी तक रेल से सफर करते हैं। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और व्यवसाय की दृष्टि से भी रेलवे की अहमियत जाहिर है। पर सारे महत्त्व के बावजूद, भारतीय रेलवे की दशा संतोषजनक नहीं कही जाएगी। सबसे शोचनीय पहलू यह है कि मुसाफिरों के लिए जो चीज सबसे ज्यादा मायने रखती है, रेल प्रशासन उसी की सबसे कम फिक्र करता है, चाहे ट्रेनों का समय से परिचालन और निर्धारित समय से गंतव्य पर पहुंचना हो, या सुरक्षा, या स्टेशनों पर साफ-सफाई या खान-पान। सीएजी यानी नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक रेलगाड़ियों में और स्टेशनों पर मुसाफिरों को न सिर्फ महंगा खाना दिया जा रहा है बल्कि वह गुणवत्ता में भी मानकों के अनुरूप नहीं होता। बीते शुक्रवार को संसद में पेश की गई यह रिपोर्ट बताती है कि रेलवे खानपान के संबंध में यह प्रावधान है कि वस्तुएं निर्धारित दरों पर बेची जाएंगी, प्रत्येक वस्तु का मूल्य रेल प्रशासन तय करेगा, यात्रियों से अधिक कीमत नहीं ली जाएगी। लेकिन यह देखा गया कि बिस्कुट, सीलबंद उत्पाद, मिठाइयां आदि (पीएडी वस्तुएं) खुले बाजार की तुलना में भिन्न वजन और भिन्न मूल्य से रेलवे स्टेशनों पर बेची जा रही थीं। जुर्माना लगाए जाने के बाद भी मुसाफिरों से ज्यादा कीमत वसूलने और शोषण के मामले जारी रहे। इस रिपोर्ट से ठेकेदारों की मनमानी जाहिर है। पर सवाल है कि रेल प्रशासन क्या करता है जिस पर निगरानी रखने और गड़बड़ी किए जाने पर कार्रवाई करने का जिम्मा है?

स्टेशनों के अलावा रेलगाड़ियों के भीतर मिलने वाले भोजन को लेकर भी शिकायतें आम हैं। सुस्वादु होना तो दूर, उसे सेहत के लिए निरापद भी नहीं कहा जा सकता। बनाने-पकाने के दौरान अपेक्षित सावधानी और सफाई नहीं बरती जाती। जब राजधानी जैसी आला दर्जे की ट्रेनों में सफर करने वाले अक्सर यह शिकायत करते मिलते हैं, तो सामान्य श्रेणी की ट्रेनों में क्या हाल होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। दरअसल, मुसाफिर रोजाना जो भुगतते रहे हैं, सीएजी की रिपोर्ट ने उसी की पुष्टि की है। कुछ सालों से रेलवे को विश्वस्तरीय बनाने का दम भरा जा रहा है। इसके लिए विदेशी निवेश आमंत्रित करने तथा कुछ देशों की विशेषज्ञता का लाभ लेने की बातें कही जाती रही हैं। लेकिन ये सब दीर्घकालीन परियोजनाएं हैं और इस दिशा में प्रगति का आकलन अभी नहीं हो सकता। पर सुरक्षा, ट्रेनों के समय से परिचालन तथा समय से गंतव्य पर पहुंचने और साफ-सफाई व खान-पान सेवा में सुधार जैसी कसौटियों पर खरा उतरने के लिए रेलवे को कितना वक्त चाहिए?

जाहिर है, असल समस्या अनुशासन तथा यात्रियों के प्रति संवेदनशीलता की कमी की है। यह सही है कि साफ-सफाई अकेले रेल प्रशासन या संबंधित एजेंसी के बूते की बात नहीं है, इसके लिए मुसाफिरों को जागरूक करना होगा, ऐसा माहौल बनाना होगा कि सफर के दौरान सफाई का ध्यान रखने का मनोवैज्ञानिक दबाव हर किसी को महसूस हो। पर भोजन तैयार करने की प्रक्रिया में स्वच्छता, गुणवत्ता तथा सेहत के तकाजे की जो अनदेखी होती है, उसका ठीकरा रेलवे किसके सिर फोड़ेगा? फ्रेट कॉरीडोर बनाने और रेलगाड़ियों की रफ्तार बढ़ाने आदि की महत्त्वाकांक्षी योजनाएं अपनी जगह हैं, इनका हवाला देकर रेलवे मुसाफिरों के प्रति रोजाना की अपनी जिम्मेवारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

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