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वोट और नोट

अन्नाद्रमुक के शशिकला के नेतृत्व वाले धड़े ने यहां से टीटीवी दिनाकरन को उम्मीदवार बनाया था, जो शशिकला के भतीजे हैं।

Author April 11, 2017 5:07 AM
शशिकला को AIADMK के महासचिव के पद से हटा दिया गया है। ( Photo Source: PTI)

आखिरकार निर्वाचन आयोग ने तमिलनाडु की आरके नगर विधानसभा सीट के लिए होने वाला उपचुनाव मतदान से महज तीन दिन पहले रद््द कर दिया। यह वाकया बताता है कि जिस चुनाव को हम लोकंतत्र की सबसे बुनियादी शर्त और लोकतंत्र का पर्व कहते आए हैं वह किस हद तक सड़ गया है। चेन्नई के तहत आने वाले आरके नगर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव आयोग को इसलिए रद््द करना पड़ा कि वहां बड़े पैमाने पर मतदाताओं को खरीदे जाने की शिकायतें थीं। जो चीजें बांटी जा रही थीं उनमें नकद राशि के अलावा साड़ी, हैट, रिचार्ज कूपन से लेकर अखबार की ग्राहकी तक बहुत कुछ शामिल था। यह सूची बताती है कि मतदाताओं को प्रलोभित करने के कितने तरीके ईजाद कर लिए गए हैं। इस उपचुनाव में वोट खरीदने के काम में सबसे ज्यादा सक्रिय अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता थे। असल में अन्नाद्रमुक के लिए यह उपचुनाव बहुत मायने रखता था क्योंकि आरके नगर सीट जयललिता के निधन के कारण खाली हुई है। यहां से चुनाव जीतने का मतलब होगा जयललिता की विरासत पर हक जताना।

अन्नाद्रमुक के शशिकला के नेतृत्व वाले धड़े ने यहां से टीटीवी दिनाकरन को उम्मीदवार बनाया था, जो शशिकला के भतीजे हैं। भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने से ऐन पहले शशिकला ने दिनाकरन को पार्टी का दूसरे नंबर का पदाधिकारी नियुक्त किया था। दिनाकरन की उम्मीदवारी से जाहिर है कि अन्नाद्रमुक के लिए यह उपचुनाव कितना अहम था। मगर उसके लिए यह सीट चाहे जितनी प्रतिष्ठा की रही हो, क्या उसे वोट के बदले नोट देकर जीतने की कोशिश करनी चाहिए? हैरानी का विषय यह है कि वोटों की खरीद के कुचक्र में शामिल रहने के आरोप राज्य के कई मंत्रियों पर भी लगे हैं। पिछले हफ्ते आय कर विभाग के छापे में बरामद हुए दस्तावेज बताते हैं कि करोड़ों रुपए वोटों की खरीद के लिए तय थे। बरामद दस्तावेजों से यह भी संकेत मिलता है कि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री किस तरह पदोन्नति और तबादलों के जरिए तथा मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों से पैसा बना रहे थे। आरके नगर कोई अपवाद नहीं था। मतदाताओं को रुपया या साड़ी, कंबल आदि बांटने और तरह-तरह से प्रलोभित करने की दुष्प्रवृत्ति देशव्यापी होती जा रही है। इसके चलते न सिद्धांत, विचारधारा और मुद््दों का कोई अर्थ रह गया है न उम्मीदवार के व्यक्तित्व, चरित्र और उसकी पृष्ठभूमि का। जिसके पास अनाप-शनाप पैसा है वह वोट खरीद ले! चुनाव के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वे मतदाताओं के राजनीतिक जागरण का जरिया और अवसर होते हैं। पर मतदाता के विवेक पर भरोसा करने के बजाय पार्टियां और उम्मीदवार पैसे की ताकत पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं।

चुनावी होड़ वोट खरीदने की होड़ में बदलती जा रही है, और फलस्वरूप चुनाव भ्रष्टाचार का खेल बनता जा रहा है। मतदाता भी देखते हैं कि किधर ज्यादा कीमत मिल रही है। नोटबंदी के समय यह कहा गया था कि इससे चुनावी भ्रष्टाचार और चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगेगी। मगर आरके नगर में इस दावे की धज्जियां उड़ गर्इं। आरके नगर में चुनाव आयोग ने अनियमितताओं पर नजर रखने के लिए विशेष इंतजाम किए थे। पहली बार ऐसा हुआ जब किसी विधानसभा सीट के लिए छह विशेष पर्यवेक्षक भेजे। कई पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया। लेकिन आयोग हर जगह और हर समय मौजूद नहीं रह सकता। हमारे लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा के लिए यह जरूरी है कि वोट-खरीद के खिलाफ देश भर में जन-जागृति पैदा की जाए।

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