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प्रदूषण और प्रमाणपत्र

एक गैर-सरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि प्रदूषण जांच केंद्रों की कार्यप्रणाली चिंताजनक है, जबकि वास्तव में प्रभावी तरीके से जांच की जा सकती है, जो कि नहीं हो रही है।

Author Published on: July 18, 2017 4:32 AM
air pollution, smog, Kashmirधुंध और प्रदूषण के बीच गुड़गांव की रैपिड मेट्रो की एक तस्वीर। PTI Photo

दिल्ली हाइकोर्ट ने दिल्ली में वाहनों के लिए अनाप-शनाप ढंग से ‘पॉल्यूल्शन अंडर कंट्रोल’ (पीयूसी) प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर केंद्र और राज्य सरकारों को आगाह किया है। न्यायालय ने कहा कि वह नहीं चाहता कि मोटर वाहनों के लिए प्रदूषण नियंत्रण नियम लागू करने की खातिर कोई विशेष अभियान छेड़ा जाए। लेकिन यह भी नहीं होना चाहिए कि नियमों में कोई ढील दी जाए। अदालत ने कहा कि सरकारें कानून का पालन करने वाली संस्कृति विकसित करें। कहने की जरूरत नहीं कि न केवल दिल्ली, बल्कि समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में कुछ बरसों में जिस मात्रा और तेजी के साथ प्रदूषण में इजाफा हुआ है, वह गहरी चिंता का विषय है। पिछले दिनों प्रदूषण को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की जो रिपोर्ट जारी हुई थी, वह आंखें खोल देने वाली है। इसके मुताबिक दुनिया के सबसे प्रदूषित बीस शहरों में तेरह भारत में हैं, जिनमें दिल्ली का स्थान अव्वल है। दिल्ली में केवल प्रदूषण की वजह से साल भर में दस से तीस हजार लोगों की मौत दिल की बीमारी और हृदयाघात से होती है।

ऐसे में अगर अदालत ने इस मुद््दे पर केंद्र और राज्य सरकारों को चेताया है तो वक्त का अहम तकाजा है। एक गैर-सरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि प्रदूषण जांच केंद्रों की कार्यप्रणाली चिंताजनक है, जबकि वास्तव में प्रभावी तरीके से जांच की जा सकती है, जो कि नहीं हो रही है। गौरतलब है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारणों में एक बड़ा कारण वाहन प्रदूषण है। दिल्ली में एक करोड़ से ज्यादा पंजीकृत वाहन हैं, जिनमें 31.32 लाख चौपहिया और 66.48 लाख दोपहिया वाहन हैं। जांच में पाया गया कि खराब उत्सर्जन मानकों के कारण ये वाहन सबसे बड़े वायु प्रदूषक हैं। हालांकि अदालतें समय-समय पर इस बारे में आदेश-निर्देश देती रही हैं। दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने तो पिछले दिनों सम-विषम फार्मूला भी निकाला था। लेकिन कोई कारगर तरीका वाहन प्रदूषणों से निपटने का अब तक नहीं निकल पाया है।

नियमानुसार हर तीन महीने पर प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र लेना जरूरी होता है। लेकिन केवल तेईस फीसद वाहनों की नियमित जांच होती है। उसमें भी प्रदूषण जांच केंद्रों पर भ्रष्टाचार और अनियमितताएं हैं। बहुतों के वाहन मानक के अनुरूप न होते हुए भी उन्हें प्रमाणपत्र दे दिया जाता है। दिल्ली में 962 प्रदूषण जांच केंद्र हैं। लेकिन ईपीसीए यानी पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण ने जब इन केंद्रों की आकस्मिक जांच की तो पाया कि वहां व्यापक भ्रष्टाचार है। दिल्ली और बाकी एनसीआर में प्रदूषण जांचने का तरीका भी अलग है, जबकि दोनों जगह के वाहनों की आवाजाही बराबर बनी रहती है। कुछ स्थलों पर तो दलालों की सक्रियता भी मिली। वाहनों के दस्तावेज रखने का इंतजाम तक ठीक नहीं था। ऐसी स्थिति में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रमाणपत्र जारी करने वाली एजेंसियां कितनी ईमानदारी से काम करती होंगी। अब अदालत ने इस गड़बड़ी की तरफ ध्यान खींचा है तो यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे इस दिशा में कारगर पहल करें और हर हाल में कानूनों का पालन सुनिश्चित करें।

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