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वार्ता की राह

स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कश्मीर समस्या न गोली से सुलझेगी न गाली से, बल्कि कश्मीर समस्या सुलझेगी कश्मीरियों को गले लगाने से।

Author October 25, 2017 01:17 am
जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर के विभिन्न पक्षों से बातचीत के लिए वार्ताकार की नियुक्ति केंद्र की सही पहल है। वार्ताकार के रूप में आइबी के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा के नाम का एलान कर केंद्र ने उस उम्मीद की दिशा में कदम बढ़ाया जो सवा दो माह पहले प्रधानमंत्री ने जगाई थी। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कश्मीर समस्या न गोली से सुलझेगी न गाली से, बल्कि कश्मीर समस्या सुलझेगी कश्मीरियों को गले लगाने से। उनके इस कथन से लगा था कि केंद्र की तरफ से कोई विशेष घोषणा होगी। पर जल्द कुछ न होने से निराशा के स्वर भी उभरे। पर लगता है केंद्र को अनुकूल स्थिति का इंतजार था। सितंबर में गृहमंत्री राजनाथ सिंह जम्मू-कश्मीर के चार दिवसीय दौरे पर गए थे और तब उन्होंने बहुत-से समूहों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। फिर, पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक शेष पाल वैद ने दो टूक कहा कि इस साल एक सौ साठ उग्रवादी मारे जा चुके हैं; अब राज्य में राजनीतिक पहल की जरूरत है। इसी तरह की बात हाल में कई सैन्य अधिकारी भी कह चुके हैं। विपक्ष तो और पहले से इस बात की वकालत कर रहा था कि केंद्र को कश्मीरियों से संवाद का रिश्ता कायम करना चाहिए, क्योंकि उनका भरोसा जीते बगैर स्थायी शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी यही चाहता रहा होगा।

वार्ताकार नियुक्त करने का केंद्र का कदम इन सारे आग्रहों के अनुरूप है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने वार्ताकार के तौर पर दिनेश्वर शर्मा के नाम का एलान करते हुए कहा है कि वे राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधियों, विभिन्न संगठनों और संजीदा व्यक्तियों से बात करेंगे। पर क्या हुुर्रियत से भी बात होगी? इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब राजनाथ सिंह ने नहीं दिया, सिर्फ इतना कहा कि दिनेश्वर शर्मा को पूरी आजादी होगी कि वे चाहे जिससे बात करें। केरल काडर के 1979 बैच के पूर्व आइपीएस अफसर शर्मा अगस्त में मणिपुर सरकार और कुकी संगठनों के बीच वार्ता में केंद्र के प्रतिनिधि रह चुके हैं। पर कश्मीर की समस्या ज्यादा पुरानी, जटिल और नाजुक है। कोई भी यह अंदाजा लगा सकता है कि हुर्रियत को बातचीत में शामिल करने की संभावना केवल शर्मा की मर्जी पर निर्भर नहीं करेगी, इसके लिए केंद्र की हरी झंडी जरूरी होगी।

यों वाजपेयी सरकार के दौरान हुई पहल में राज्य की सभी पार्टियों और तमाम सामाजिक संगठनों के नुमाइंदों के अलावा हुर्रियत को भी बातचीत में शामिल किया गया था। पर ताजा पहल ऐसे वक्त हुई है जब हाल में एनआइए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय ने एक के बाद एक हुर्रियत के कई नेताओं के घरों-ठिकानों पर छापे मारे थे और संदिग्ध लेन-देन में उनके लिप्त रहने के सबूत जुटाने का दावा भी किया। हुर्रियत के जिन लोगों की गिरफ्तारी हुई उनमें हुर्रियत के एक धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी के दामाद अल्ताफ शाह उर्फ फंटूश भी शामिल हैं। बहरहाल, कश्मीर समस्या से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती घाटी के लोगों खासकर युवाओं का विश्वास जीतना है, उनके मन में यह बात बिठानी है कि उनकी भलाई भारत का हिस्सा बने रहने में ही है। इस तकाजे का पहला बिंदु यह है कि कश्मीर समस्या को राज्य में भी और बाकी देश में भी हिंदू-मुसलिम के नजरिए से न देखा जाए।

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