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विपक्ष के विरोधाभास

शीतकालीन सत्र के दौरान संसद के भीतर विपक्ष की जैसी एकजुटता दिखी थी, वह मंगलवार को बुलाई गई बैठक और संवाददाता सम्मेलन में नदारद रही।

Author December 28, 2016 1:27 AM
नई दिल्ली में नोटबंदी के खिलाफ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (PTI Photo by Manvender Vashist/27 Dec, 2016)

शीतकालीन सत्र के दौरान संसद के भीतर विपक्ष की जैसी एकजुटता दिखी थी, वह मंगलवार को बुलाई गई बैठक और संवाददाता सम्मेलन में नदारद रही। सभी विपक्षी दलों की बैठक और फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस कांग्रेस ने बुलाई थी। इसमें कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने वालों में सबसे प्रमुख नाम था पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी का। दोनों ने एक बार फिर नोटबंदी के मसले पर प्रधानमंत्री पर जमकर हमला बोला। लेकिन विडंबना यह कि इस बैठक का जो हाल हुआ वह मोदी और भाजपा को ही रास आया होगा। कहने को बैठक विपक्ष की साझा रणनीति तैयार करने के मकसद से बुलाई गई थी, पर आगे का कोई साझा कार्यक्रम बनना तो दूर, सबकी मौजूदगी भी नहीं हो सकी। तृणमूल और राष्ट्रीय जनता दल को छोड़ दें, तो समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल (यू) और वाम दलों समेत अनेक प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने इस बैठक से किनारा कर लिया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सफाई के अंदाज में कहा किअधिकतर विपक्षी दलों की भागीदारी इसलिए नहीं हो सकी, क्योंकि उनके क्षेत्रीय या प्रांतीय अंतर्विरोध हैं; इसका यह अर्थ नहीं कि विपक्ष में कोई दरार पड़ गई है; जो आज नहीं आए हैं वे कल आ सकते हैं।

यह सही है कि विपक्ष के अपने विरोधाभास हैं। जो केंद्र में सत्तापक्ष से जूझते दिखते हैं, राज्यों में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। मसलन, उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा। इसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल और वाम दल तथा केरल में माकपा और कांग्रेस व तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक। इसलिए जहां ममता बनर्जी मोर्चा संभाले नजर आएं, वहां माकपा और भाकपा का मौजूद न रहना स्वाभाविक है। लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। दरअसल, नोटबंदी के मसले पर सारे विपक्ष का रुख समान नहीं है। जैसे, नीतीश कुमार नोटबंदी का समर्थन कर चुके हैं। फिर, वे ममता बनर्जी से खफा भी बताए जाते हैं, जिन्होंने पटना की सभा में उन्हें कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बीजू जनता दल और अन्नाद्रमुक ने खामोश रहना ही बेहतर समझा है। फिर, कई पार्टियां ऐसी हैं जो नगदी की किल्लत से लोगों को होने वाली परेशानियों को लेकर तो सरकार को घेरना चाहती हैं, मगर सीधे नोटबंदी का ही विरोध नहीं करना चाहतीं, जैसा कि ममता बनर्जी कर रही हैं। अरविंद केजरीवाल नोटबंदी और मोदी के विरुद्ध चाहे जितने मुखर हों, मगर राष्ट्रपति को ज्ञापन देने जैसे एकाध मौकों को छोड़ दें तो आम आदमी पार्टी विपक्ष की साझा कवायद से अमूमन दूर ही रही है।

इतने सारे विरोधाभास तो पहले से ही थे, राहुल गांधी के एक व्यवहार ने कई पार्टियों को नाराज कर दिया। संसद के शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात को विपक्ष की अनेक पार्टियां अब भी नहीं पचा पा रही हैं। हो सकता है इस नुकसान की भरपाई करना भी, यानी विपक्षी राजनीति के बीच राहुल व कांग्रेस की साख बढ़ाना भी मंगलवार को बुलाई गई बैठक का एक उद््देश्य रहा हो। लेकिन इस मकसद को भी फौरी तौर पर पलीता ही लगा है। वाम दलों समेत कई पार्टियों ने कहा है कि ताजा बैठक की बाबत उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया था। बहरहाल, विपक्ष के तमाम विरोधाभास बने रहेंगे। पर विपक्ष की ज्यादा बड़ी समस्या साख की है, जिसके चलते उसकी आवाज पुरअसर नहीं हो पा रही है।

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