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साल भर बाद

विपक्षी दलों ने जहां आठ नवंबर को काला दिवस मनाने की घोषणा करते हुए देश भर में विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए हैं, वहीं भाजपा ने इस दिन काला धन विरोधी दिवस मनाने का तय किया है।

Author November 8, 2017 5:09 AM
नोटबंदी के बाद कैश निकालने के लिए बैंक एटीएम की लाइन में लगे लोग।

साल भर बाद भी नोटबंदी तीखे विवाद और राजनीतिक रस्साकशी का विषय बनी हुई है। पिछले साल आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ तथा हजार रुपए के नोटों के विमुद्रीकरण का एलान किया था। इसका एक साल पूरा होने के मौके पर सत्तापक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। विपक्षी दलों ने जहां आठ नवंबर को काला दिवस मनाने की घोषणा करते हुए देश भर में विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए हैं, वहीं भाजपा ने इस दिन काला धन विरोधी दिवस मनाने का तय किया है। पर यह साफ है कि नोटबंदी को लेकर तब सरकार जहां खम ठोंक कर कई सारे दावे कर रही थी, और तमाम तकलीफों के बावजूद अधिकांश लोग उसके इस फैसले को काले धन के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देख रहे थे, वहीं अब सरकार और भाजपा बचाव की मुद्रा में हैं और आम लोगों के बीच नोटबंदी के प्रति समर्थन या उत्साह का भाव घटता गया है। मंगलवार को जहां विपक्ष के नजरिए का इजहार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया, वहीं सत्तापक्ष की तरफ से मोर्चा संभाला वित्तमंत्री अरुण जेटली ने। मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को ‘संगठित लूट और कानूनी डकैती’ करार दिया, तो जेटली ने जीएसटी के अलावा नोटबंदी को भी ढांचागत सुधार का कदम बताया और कहा कि इससे कुछ परेशानी भले हुई हो, देर-सबेर इसके सुपरिणाम अवश्य सामने आएंगे।

सत्तापक्ष के धुर समर्थन और विपक्ष के धुर विरोध के माहौल के बीच नोटबंदी के प्रभाव का तटस्थ आकलन आसान नहीं है। पर यह जरूर कहा जा सकता है कि शुरू में किए गए कई दावे सही नहीं निकले। कहा गया था कि काला धन तो खत्म होगा ही, जाली मुद्रा से निजात मिलेगी और आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। काले धन पर क्या असर पड़ा, यह इसी तथ्य से जाहिर है कि विमुद्रीकृत की गई लगभग सारी राशि बैंकों में वापस लौट आई। नोटबंदी के बाद भी आतंकवादी घटनाएं जारी रहीं। दो हजार के जाली नोट पकड़े जाने के न जाने कितने मामले सामने आ चुके हैं। नोटबंदी से लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था को लाभ होने के सरकार के दावे का इम्तहान शायद अभी नहीं हो सकता, पर पिछले एक साल में नुकसान के नजारे ही दिखे हैं। खासकर छोटे-मझोले कारोबार पर बुरा असर पड़ा है और इनमें काम करने वाले बहुत-से लोगों का रोजगार या तो छिन गया है या अनिश्चित हो गया है। बेशक, इसमें नोटबंदी के कोई आठ महीने बाद लागू किए गए जीएसटी का भी योगदान रहा है।

मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए काला दिन करार देने के साथ ही इसे भारत के लोकतंत्र पर हमला भी कहा है; दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में छियासी फीसद मुद्रा अचानक चलन से बाहर नहीं की गई। यह कदम गरीबों के लिए क्रांतिकारी साबित हुआ या नहीं, कितना सख्त था यह इसी से समझा जा सकता है कि सारा देश हफ्तों तक घंटों कतारों में खड़े रहने को विवश रहा और सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई। यह अफसोस की बात है कि नोटबंदी के आकलन में इस पहलू का बहुत कम जिक्र होता रहा है। अधिकांश बहस जीडीपी पर पड़े असर को लेकर होती रही है। नोटबंदी से जीडीपी की वृद्धि दर में करीब दो फीसद की गिरावट आने की आशंका सही साबित हुई। सरकार नोटबंदी से दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को लाभ होने का भरोसा दिला रही है, पर पिछले एक साल में जो अनुभव हुआ उसे स्वीकार भी तो करना चाहिए।

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