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संपादकीय: आतंक के पांव

अंदाजा लगाया जा सकता है कि आतंकवाद को काबू में करने के लिए की जा रही सरकारी कवायदों के बरक्स जमीनी हकीकत किस कदर चिंताजनक है। खुद गृह मंत्रालय के मुताबिक कश्मीरी युवाओं के बीच जाकिर मूसा के आतंकी गुट की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

Author August 28, 2018 2:12 AM
तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ तमाम अभियानों के बावजूद अगर आतंकी संगठनों के असर में आने वाले युवाओं की तादाद में इजाफा हो रहा है तो यह गंभीर चिंता की बात है। सवाल है कि आखिर किन वजहों से सरकार, पुलिस और सेना के तमाम प्रयास आतंकवादियों की रीढ़ तोड़ने में नाकाम साबित हो रहे हैं। क्या यह आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाने में कोताही का नतीजा है या फिर इसकी दिशा में कोई कमी है? गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों से ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं कि कश्मीर में बहुत सारे युवा आतंकवादी गुटों के प्रभाव में आ रहे हैं। वर्ष 2014 में जहां तिरेपन युवा आतंकी गुटों में शामिल हो गए थे, वहीं 2016 में यह संख्या अट्ठासी तक चली गई। यों इस समूचे इलाके में कई आतंकी संगठन युवाओं को अपने जाल में फंसाने की कोशिश में लगातार लगे रहते हैं। लेकिन इस साल कश्मीरी युवाओं के बीच सबसे ज्यादा घुसपैठ एक नए आतंकी संगठन जाकिर मूसा समूह ने की। खबरों के मुताबिक जाकिर मूसा समूह में एक सौ तीस युवक शामिल हुए।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि आतंकवाद को काबू में करने के लिए की जा रही सरकारी कवायदों के बरक्स जमीनी हकीकत किस कदर चिंताजनक है। खुद गृह मंत्रालय के मुताबिक कश्मीरी युवाओं के बीच जाकिर मूसा के आतंकी गुट की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है। इससे पहले करीब ढाई दशक से ज्यादा समय से इस क्षेत्र में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलगाववादी नेताओं का दबदबा कायम था। लेकिन अब जाकिर मूसा गुट का असर बढ़ता दिख रहा है तो इसका एक मतलब यह हो सकता है कि आतंकवादी समूहों के बीच भी अपनी दिशा और संघर्ष के तौर-तरीकों को लेकर मतभेद उपजे हैं। लेकिन इससे यह अंदाजा लगा लेना सही रणनीति नहीं होगी कि उनके बीच इन मतभेदों या नए गुट बनने की प्रक्रिया से वहां आतंकवाद की समस्या कमजोर पड़ रही है। बल्कि इसके उलट यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जाकिर मूसा गुट युवाओं को अपने जाल में फंसा रहा है तो यह ज्यादा खतरनाक है और सरकार को अपनी रणनीति उसी को ध्यान में रख कर बनानी चाहिए। सही है कि सरकार ने इस स्थिति से निपटने में शायद कोई कमी नहीं की होगी। घाटी में सुरक्षा बलों ने आतंकियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन ऑल आउट’ चलाया हुआ है। इस दौरान सुरक्षा बलों को काफी कामयाबी मिली और कई शीर्ष आतंकियों को मार गिराया गया। इसके बावजूद अगर यह समस्या गहराती जा रही है तो उससे निपटने के तौर-तरीकों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

कुछ समय पहले आतंकी समूहों के असर में आए युवाओं को फिर से मुख्यधारा में लौटने के लिए उनके परिवारों के जरिए अपील की गई थी। उसके सकारात्मक असर भी सामने आए थे, जब एक मां की अपील पर उनका बेटा आतंक का रास्ता छोड़ कर घर लौट आया। फिर एक गिरफ्तार आतंकी ने अपने साथियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील की। जाहिर है, आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई भी रियायत बरते बिना उन कारणों पर भी गौर करने की जरूरत है, जो युवाओं को आतंकवाद की ओर ले जाते हैं। आतंकी संगठन अगर अपनी विचारधारा का प्रसार करने के लिए युवाओं को निशाना बना रहे हैं तो सरकार और सुरक्षा बलों को इस पहलू पर भी ध्यान देना होगा कि युवकों को कैसे उनके असर से बचाया जा सकता है। बल्कि आतंकवाद के खिलाफ एक बेहतर और सभ्य समाज का महत्त्व समझाने के लिए युवाओं के बीच एक ठोस कार्ययोजना पर काम करने की भी जरूरत है।

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