ताज़ा खबर
 

अपना अपना मोर्चा

हजार और पांच सौ रुपए के नोटों को अचानक अमान्य कर दिए जाने से पैदा हालात ने सियासी तापमान भी बढ़ा दिया है।

Author Published on: November 16, 2016 12:51 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर। (Photo: PTI)

हजार और पांच सौ रुपए के नोटों को अचानक अमान्य कर दिए जाने से पैदा हालात ने सियासी तापमान भी बढ़ा दिया है। यों भी संसद का नया सत्र शुरू होना हो, तो उसके पहले विपक्ष जायजा लेने लगता है कि उसके पास कौन-कौन से तीर हैं। नोटबंदी ने तो विपक्ष के हाथ में बड़ा मुद््दा थमा दिया है। बुधवार से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है। सोमवार को विपक्षी दलों की बैठक नोटबंदी के मसले पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए ही बुलाई गई थी। इसलिए शीतकालीन सत्र की तूफानी शुरुआत होना तय है। दूसरी तरफ सरकार अपने फैसले को हर तरह से ठीक और जरूरी ठहरा रही है। सोमवार को हुई राजग की बैठक में जिस तरह प्रधानमंत्री के फैसले के प्रति समर्थन और एकजुटता दिखाई गई उससे जाहिर है कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जमकर तकरार होनी है। और जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने हों, तो कोई इसमें पीछे क्यों रहना चाहेगा?

आखिर क्या वजह है कि विमुद्रीकरण या नोटबंदी के फैसले के बाद देश भर में मचे कोहराम के बावजूद प्रधानमंत्री ललकार रहे हैं और पूरा राजग उनके सुर में सुर मिला रहा है। शिवसेना जरूर अपवाद है, पर यह किसी से छिपा नहीं है कि उद्धव ठाकरे पहले से ही भाजपा से खिन्न चल रहे हैं और गठबंधन से उनके अलग होने की अटकल भी लगाई जाने लगी है। राजग की प्रतिक्रिया उसकी सियासी मजबूरी भी हो सकती है। पर सत्तापक्ष के रुख के पीछे एक और कारण है। उसे लगता है कि विमुद्रीकरण के फैसले को काले धन के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम के रूप में प्रचारित कर इसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है। शायद प्रधानमंत्री इसे अमीर बनाम गरीब की लड़ाई की शक्ल देने में भी सफल हों।

गाजीपुर की रैली में अपने इस इरादे की झलक वे दिखला चुके हैं। लेकिन यह दावा नहीं किया जा सकता कि सत्तापक्ष अपनी इस रणनीति में कामयाब होगा ही। संदेह के कई कारण हैं। सबसे बड़ी वजह यह है कि नोटबंदी के फैसले ने देश की लगभग समूची आबादी को गुजारे के संकट में डाल दिया है। अगर दो-चार दिन में स्थिति सामान्य हो जाती, तो और बात थी। पर हफ्ते भर बाद भी नोट बदलने और नोट निकासी के लिए अंतहीन भीड़, घंटों कतार में खड़े रहने की तकलीफों, रोजी-रोटी और तमाम व्यवसायों पर पड़ रहे बुरे असर के कारण मोदी ने ऐसे लोगों की भी नाराजगी मोल ले ली है, जो शुरू-शुरू में सरकार के फैसले की सराहना कर रहे थे।

अब देश में यह आम राय बन गई लगती है कि सरकार ने बिना तैयारी के इतना बड़ा कदम उठा लिया, जिसका खमियाजा हर परिवार को भुगतना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री ने पचास दिन का समय मांगा है। पर एक हफ्ता बीतते-बीतते लोगों का धीरज जवाब देता लग रहा है। यही नहीं, फैसले की संजीदगी पर भी सवाल उठ रहे हैं। मसलन, कांग्रेस ने आंकड़ों के हवाले से आरोप लगाया है कि सितंबर में बैंकों में नगदी जमा कराने में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। उसने सवाल उठाया है कि इस तरह किस-किस को लाभ पहुंचाया गया? जिस दिन प्रधानमंत्री ने रात आठ बजे विमुद्रीकरण की घोषणा की, उसी दिन बंगाल भाजपा के भारी मात्रा में नगदी अपने खाते में जमा कराने की खबर भी आ चुकी है। ऐसे में विमुद्रीकरण के फैसले को अमीर बनाम गरीब की शक्ल देना आसान नहीं होगा। विपक्ष की रणनीति में अब भी कई झोल हैं, पर यह साफ है कि उसके पास सरकार को घेरने का एक बड़ा मौका है।

बैंक पहुंची प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां; 4500 रुपए के नोट बदलवाए

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 कानून के हाथ
2 मकसद बनाम तैयारी
3 अफवाहों का बाजार
ये पढ़ा क्या?
X