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सख्ती की मुद्रा

बैंकों से नकदी निकालने की सीमा काफी कम रखी जाने के कारण करीब महीने भर तक परेशानी रहनी है।

Author नई दिल्ली | Published on: November 10, 2016 3:32 AM
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी 2000 का नया नोट। (फोटो- ट्विटर)

भ्रष्टाचार और कालेधन पर नकेल कसने के मकसद से सरकार ने पांच सौ और हजार रुपए के नोट औचक बंद कर दिए। माना जा रहा है कि इस कदम से कर चोरी के मामले उजागर हो सकेंगे, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, काले धन को रद्द किया जा सकेगा और हवाला वगैरह के जरिए नकदी का प्रवाह रुक जाएगा। हालांकि सरकार के इस अचानक फैसले से आम लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं। बैंकों और डाकघरों को दो दिन के लिए बंद कर दिया गया है। इसके बाद भी बैंकों से नकदी निकालने की सीमा काफी कम रखी जाने के कारण करीब महीने भर तक परेशानी रहनी है। इस बीच जिन लोगों के घरों में शादी-विवाह जैसे मौके आने वाले हैं, उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। मगर प्रधानमंत्री ने अपील की है कि भ्रष्टाचार से लड़ने में लोग सहयोग करें, जल्दी ही परेशानियों पर काबू पा लिया जाएगा।

500 और 1000 रुपए के नोट बंद- मोदी सरकार के फैसले पर क्‍या सोचती है जनता

हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब बड़े नोटों को चलन से बाहर किया गया है। मगर इस बार लोगों में इसलिए अधिक अफरा-तफरी का माहौल है कि पहले न तो बाजार का प्रसार इतना था और न मुद्रा का प्रवाह। हालांकि ऐसे फैसलों से थोड़े समय परेशानी रहती है, नए नोट चलन में आते ही सब कुछ सामान्य हो जाता है। दरअसल, सरकार को यह फैसला इसलिए करना पड़ा कि लंबे समय से स्वैच्छिक कर घोषित करने की अपील के बावजूद लोग सकारात्मक रुख नहीं दिखा रहे थे। इसलिए इस साल कर चोरी और बेनामी संपत्ति पर अंकुश लगाने के मकसद से कानून बनाए गए, जिससे करीब सवा लाख करोड़ रुपए का काला धन सामने लाने में मदद मिली थी। पुराने बड़े नोटों के चलन से इस मामले में बड़ी कामयाबी की उम्मीद की जा रही है। सरकार का मानना है कि पांच सौ और हजार रुपए के अस्सी फीसद से अधिक नोट कालेधन के रूप में छिपाए गए हैं। इसी तरह हवाला के जरिए आतंकी संगठनों तक पहुंच रहे पैसे को रोकने में मदद मिलेगी।

हालांकि पुराने नोटों को चलन से बाहर कर देने भर से भ्रष्टाचार, कर चोरी, हवाला और कालाधन जमा करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने में कितनी मदद मिलेगी, कहना मुश्किल है। कर चोरी करने वाले कुछ बड़े कारोबारी जरूर काले धन को सफेद करने की कोशिश में जुर्माना चुकाने को आगे आएंगे, पर इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का दावा करना जल्दबाजी होगी। पहले के अनुभवों से जाहिर है कि जितने दिन पुराने नोट चलन से बाहर रहते हैं, भ्रष्टाचार जरूर रुका रहता है, पर नए नोटों के चलन में आते ही वह बेधड़क चल पड़ता है। इसी तरह हवाला कारोबार भी गति पकड़ लेगा। इसलिए ताजा फैसले का असर कुछ अधिक राजस्व उगाही में तो मदद कर सकता है, पर समस्या की असल जड़ को समाप्त करने में शायद ही कारगर साबित हो। हवाला, कर चोरी, आतंकी संगठनों को पहुंचने वाले धन पर नजर रखने के लिए कई साल पहले वित्त मंत्रालय ने एक तंत्र विकसित करने का दावा किया था, पर उसका असर नहीं हो पाया। सरकार को इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि किस तरह स्थायी रूप से इस प्रवृत्ति पर नकेल कसी जा सके।

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