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आखिर पाबंदी

पिछले महीने हुए दो बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण की निंदा करते हुए सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से इन पाबंदियों को मंजूरी दी है।
Author August 8, 2017 05:28 am
अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला करने के लिए प्रशिक्षण अभ्यास थीं (File Photo)

पिछले कुछ समय से उत्तर कोरिया ने परमाणु हथियारों या फिर मिसाइलों के परीक्षण को लेकर जिस तरह की गतिविधियां जारी रखी थीं, उनसे साफ लग रहा था कि अब उसके खिलाफ विश्व समुदाय शायद किसी ठोस फैसले पर पहुंचे। आखिरकार रविवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया पर सख्त आर्थिक पाबंदियों की घोषणा कर दी। पिछले महीने हुए दो बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण की निंदा करते हुए सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से इन पाबंदियों को मंजूरी दी है। अनुमान है कि इससे उत्तर कोरिया की सालाना आय में करीब एक अरब डॉलर की कमी आएगी। मगर जितना महत्त्व इस बात का है कि इन प्रतिबंधों से उत्तर कोरिया का आर्थिक ढांचा चरमरा जाएगा, उससे बड़ी त्रासदी यह है कि किसी मसले पर कायम जिच की वजह से दो पक्षों के बीच कितने निर्दोष नागरिकों की जान को दांव पर लगाया जाएगा! गौरतलब है कि उत्तर कोरिया ने अट्ठाईस जुलाई को उच्च क्षमता से लैस ह्वासोंग-14 मिसाइल का परीक्षण किया था। उसे कामयाब बताते हुए उत्तर कोरिया ने कहा था कि अब वह अमेरिका के किसी भी हिस्से को निशाना बना सकता है।

अगर यह दावा सही है तो अमेरिका की चिंता समझी जा सकती है। खासतौर पर तब जब विनाशक हथियारों के मसले पर दुनिया के अनेक देशों की सलाह और चेतावनी के बावजूद उत्तर कोरिया ने लगातार आक्रामक रुख अख्तियार किया हुआ है। हालांकि इस बीच अमेरिका की ओर से भी युद्ध होने और उत्तर कोरिया में भारी तबाही मचाने की धमकियां दी गर्इं, जिससे उसे यह कहने का मौका मिला कि अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु बम हासिल करने का उसका कदम न्यायोचित साबित हुआ है। उत्तर कोरिया की इस दलील को अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर नजर रखने वाले कुछ विशेषज्ञों का भी समर्थन हासिल हुआ। हालांकि उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के बारे में जिस तरह की धारणा है, उसमें किसी वार्ता की गुंजाइश पैदा होने में काफी मुश्किलें सामने आ सकती हैं। लेकिन विश्व राजनीति को अपने मुताबिक चलाने के मकसद से अमेरिका ने कुछ देशों में कैसा दखल दिया है, यह छिपा नहीं है। व्यापक संहारक क्षमता वाले रासायनिक हथियार होने की आशंका में अमेरिका और उसके मित्र देशों ने इराक को तबाह कर दिया, जबकि बाद में इराक पर लगाए गए सारे आरोप निराधार साबित हुए। यहीं एक बुनियादी फर्क है।

इराक अपने पास संहारक हथियार होने के आरोप का खंडन कर रहा था, जबकि उत्तर कोरिया ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की धमकी देता रहता है। जाहिर है, उसका रवैया विश्व-शांति के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है। इससे पहले उत्तर कोरिया और चीन यह प्रस्ताव रख चुके हैं कि अगर अमेरिका धमकी देना और उसकी सीमाओं पर सैन्य गतिविधियां रोक दे तो प्योंगयांग परमाणु विकास के कार्यक्रम खत्म कर सकता है। अमेरिका ने इस पर गौर करना जरूरी क्यों नहीं समझा? तनातनी के क्रम में जिस तरह उत्तर कोरिया की ओर से परमाणु हथियारों तक के इस्तेमाल की धमकियां सामने आ रही हैं, उसमें अगर कभी ऐसा होता है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया एक बार फिर किस तरह की त्रासदी की गवाह बनेगी। उत्तर कोरिया के प्रकरण से एक बार फिर परमाणु अप्रसार नीति की नाकामी रेखांकित हुई है। लिहाजा, पूर्ण एटमी निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को अपनाया जाना चाहिए।

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