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संपादकीयः नक्सली नासूर

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने एक बार फिर सुरक्षा बलों को चुनौती पेश की। पुलिस और सुरक्षा बल के सिपाही एक सड़क निर्माण कार्य में सुरक्षा प्रदान करने निकले थे, तभी बारूदी सुरंग में विस्फोट हुआ और सात जवान मारे गए।

Author May 21, 2018 3:59 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने एक बार फिर सुरक्षा बलों को चुनौती पेश की। पुलिस और सुरक्षा बल के सिपाही एक सड़क निर्माण कार्य में सुरक्षा प्रदान करने निकले थे, तभी बारूदी सुरंग में विस्फोट हुआ और सात जवान मारे गए। इसमें भारी मात्रा में विस्फोटक का उपयोग किया गया था। वहां एक दिन बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का दौरा पहले से तय है। मुख्यमंत्री रमन सिंह भी घटना वाले इलाके में विकास यात्रा निकालने वाले हैं। ऐसे में नक्सलियों ने यह विस्फोट कर एक तरह से संकेत दिया है कि अपने खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई से उनका मनोबल डिगा नहीं है। हालांकि राज्य के नक्सल विरोधी अभियान के उप-महानिरीक्षक का कहना है कि जिस तरह नक्सलियों को आमने-सामने की लड़ाई में शिकस्त मिली है, वे उससे बौखलाए हुए हैं और यह विस्फोट उसी बौखलाहट का नतीजा है। हालांकि करीब दो महीने पहले सुकमा में भी इसी तरह विस्फोट कर नक्सलियों ने सुरक्षा बल के नौ जवानों की जान ले ली थी। इससे ऐसा नहीं लगता कि नक्सली समस्या पर काबू पाने में सुरक्षा बलों की चुनौतियां कम हुई हैं।

मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि बारूदी सुरंग का पता लगाना और उससे पार पाना सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती है। सड़क निर्माण के दौरान नक्सली सड़क के नीचे बारूद लगाने में कामयाब होते हैं। सुरक्षा बलों के पास अभी तक ऐसा कोई उपकरण नहीं है, जिसके जरिए जमीन के नीचे एक फुट से अधिक गहराई में रखे विस्फोटक की जानकारी हासिल की जा सके। अगर इस दिशा में कामयाबी मिल जाती है, तो छह महीने के भीतर नक्सलियों का सफाया किया जा सकता है। नक्सलियों पर नकेल कसने के प्रयास लंबे समय से हो रहे हैं। हमेशा दावा किया जाता है कि उनके साजो-सामान के रास्ते बंद कर दिए गए हैं, उनकी संख्या लगातार घट रही है, पर थोड़े-थोड़े अंतराल पर वे किसी न किसी बड़ी घटना को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं।

नोटबंदी के बाद दावा किया गया था कि नक्सलियों के गोला-बारूद-हथियार खरीद पर रोक लग गई है, अब वे ज्यादा दिन नहीं टिक पाएंगे, पर यह दावा गलत साबित हुआ। सवाल है कि अगर सचमुच उनके हथियार और बारूद वगैरह की आपूर्ति के रास्ते पर कड़ी नजर रखी जा रही है, तो वे इतनी भारी मात्रा में बारूद कहां से हासिल कर पा रहे हैं कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बारूदी सुरंग से विस्फोट करने में कामयाब हो रहे हैं। फिर पुलिस और सुरक्षा बलों का खुफिया तंत्र और स्थानीय लोगों से तालमेल क्यों ठीक नहीं बन पा रहा कि उन्हें नक्सली योजनाओं के बारे में पहले ही पता चल सके।

नक्सलियों की लड़ाई पारंपरिक और प्राकृतिक संसाधनों- जल, जंगल, जमीन छीनने और औद्योगिक समूहों को बेचे जाने के खिलाफ शुरू हुई थी। वे आदिवासी इलाकों में किसी भी तरह के विकास कार्य का विरोध करते हैं। उनके इस हिंसक विरोध पर काबू पाने के लिए हथियार का सहारा लिया गया। इस तरह हिंसा का सिलसिला तेज हुआ और बहुत सारे बेगुनाह लोग भी इसकी चपेट में आए। इससे उपजे आक्रोश के चलते भी नक्सलियों को अनेक स्थानीय लोगों का समर्थन और सहयोग मिलता रहा है। ऐसे में, सरकार जब तक स्थानीय लोगों का भरोसा नहीं जीतती, तब तक नक्सलियों पर पूरी तरह नकेल कसना कठिन बना रहेगा। फिर, गोला-बारूद और दूसरे साजो-सामान की आपूर्ति पर नजर रखने वाले तंत्र को और चौकस बनाना होगा।

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