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आखिरकार नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस का दामन थाम लिया, और इसी के साथ ही उन्हें लेकर महीनों से चल रही अटकलों पर विराम लग गया।

Author January 17, 2017 12:58 AM
पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू आधिकारिक रूप से कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।

आखिरकार नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस का दामन थाम लिया, और इसी के साथ ही उन्हें लेकर महीनों से चल रही अटकलों पर विराम लग गया। पर यह घटना सिर्फ उनके राजनीतिक कैरियर के लिहाज से मायने नहीं रखती, इसका ज्यादा महत्त्व इस बात में है कि उनके इस कदम से कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर या राज्य के चुनावी परिदृश्य पर क्या असर पड़ेगा। क्रि केट हमारे देश में जुनून की हद तक लोकप्रिय खेल है। नवजोत सिंह सिद्धू ने क्रिकेटर के तौर पर काफी नाम कमाया। वे बरसों से टीवी का भी एक जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं। सिद्धू पहले भाजपा में थे और अमृतसर सीट से लोकसभा के सदस्य रहे थे। वे पिछले लोकसभा चुनाव के समय से पार्टी से नाराज चल रहे थे, क्योंकि अमृतसर से पार्टी ने उनकी जगह अरुण जेटली को उतार दिया। हालांकि जेटली हार गए, पर अमृतसर सीट से बदखल किए जाने से पैदा हुई सिद्धू की नाराजगी कायम रही। पार्टी ने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता दे दी, पर वे संतुष्ट नहीं हुए। क्या पता, उनके खफा रहने के पीछे कुछ और वजहें भी रही हों। जो हो, सिद्धू ने पिछले साल जुलाई में राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था। सितंबर में उन्होंने भाजपा से भी नाता तोड़ लिया। फिर उन्होंने पूर्व हॉकी-कप्तान परगट सिंह और बैंस बंधुओं यानी बलविंदर बैंस और सिमरजीत बैंस के साथ मिल कर आवाज-ए-पंजाब नाम से एक मंच या मोर्चा बनाया।

पर इस मोर्चे की अपनी ताकत इतनी नहीं थी कि वह पूरे राज्य में चुनाव को प्रभावित कर सके, कुछ चुनिंदा सीटों पर ही वह हाथ आजमा सकता था। अलबत्ता वह भी जोखिम भरा होता। फिर, आवाज-ए-पंजाब ने सिद्धू का साथ छोड़ कर आम आदमी पार्टी से गठजोड़ कर लिया। तब से उनके भी आप में शामिल होने की अटकलें चल रही थीं, लेकिन बात बनी कांग्रेस से। निश्चय ही यह कांग्रेस के लिए उत्साह बढ़ाने वाली बात है। सिद्धू की पत्नी, जो कि अमृतसर-पूर्व सीट से विधायक रहीं, पहले ही कांग्रेस में शामिल हो चुकी थीं। सिद्धू को पार्टी में शामिल करने और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ कैप्टन अमरिंदर सिंह को उम्मीदवार बनाने के पीछे कांग्रेस की रणनीति जाहिर है। यह आम धारणा है और समय-समय पर हुए कई सर्वेक्षणों ने भी इसके संकेत दिए हैं कि एक दशक से राज कर रहे बादल सत्ता-विरोधी रुझान का सामना कर रहे हैं। अकाली-भाजपा सरकार से छुटकारा दिलाने में सक्षम होने का भरोसा जो जगा सकेगा, बाजी उसी के हाथ लगेगी। अगर आम आदमी पार्टी का उभार न हुआ होता, तो कांग्रेस को इस बार ज्यादा चिंता करने की जरूरत न थी। पर आप की सशक्त मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि विपक्ष की नंबर एक शक्ति कौन है।

सिद्धू को अपनी तरफ लाकर और मुख्यमंत्री बादल के खिलाफ अमरिंदर सिंह को उतारने की घोषणा कर जहां कांग्रेस ने सत्तारूढ़ गठजोड़ के खिलाफ अपनी घेराबंदी मजबूत करने की कोशिश की है, वहीं आम आदमी पार्टी पर बढ़त बनाने की भी। बादल को भी इस बार सत्ता-विरोधी रुझान का कुछ अहसास होगा, पर उनकी उम्मीद इस पर टिकी है कि सत्ता-विरोधी वोटों का कांग्रेस और आप के बीच लगभग समान बंटवारा हो जाए। नतीजे क्या होंगे, यह तो ग्यारह मार्च को पता चलेगा। मगर यह साफ दिख रहा है कि पंजाब में सत्तारूढ़ गठजोड़ के लिए यह चुनाव बहुत ही चुनौतियां भरा है।

कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा- “मैं पैदायशी कांग्रेसी हूं, ये मेरी घर वापसी है”

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