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आंदोलन का रास्ता

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस की गोली से मारे गए किसानों के परिजनों से मिलने के बाद अपना शांति उपवास तोड़ दिया है।
Author June 12, 2017 05:17 am
प्रदेश किसान महापंचायत ने भी किसानों की लंबित मांगों को लेकर आंदोलन का एलान किया है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस की गोली से मारे गए किसानों के परिजनों से मिलने के बाद अपना शांति उपवास तोड़ दिया है। उन्होंने मारे गए किसानों के आश्रितों को शिक्षा और रोजगार में मदद मुहैया कराने का भरोसा दिलाया और किसानों की दशा सुधारने के लिए नीतियां बनाने का वादा किया है। मगर इसके बावजूद किसान आंदोलन में नरमी का रुख नजर नहीं आ रहा। फसलों की बेहतर कीमत दिलाने और कर्ज माफी की मांग लेकर किसानों ने मंदसौर इलाके में आंदोलन शुरू किया तो उसे रोकने के प्रयास में बीते बुधवार को पुलिस ने गोलियां चलाईं और पांच किसान मारे गए। इस तरह इस आंदोलन में अब तक छह किसानों की जानें जा चुकी हैं। मध्यप्रदेश की इस घटना के बाद पूरे देश के किसान आंदोलन के लिए कमर कस चुके हैं। भारतीय किसान यूनियन सहित कई किसान संगठनों ने एकजुट होकर आंदोलन का मन बना लिया है। ऐसे में अब सिर्फ मध्यप्रदेश सरकार नहीं, केंद्र सरकार के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

मध्यप्रदेश में मंदसौर और नीमच के जिस इलाके से आंदोलन की शुरुआत हुई, वहां के किसान देश के दूसरे कई हिस्सों की अपेक्षा कुछ सुर्खरू हैं। मगर उनमें सरकार के खिलाफ आक्रोश इसलिए फूटा कि व्यावहारिक नीति न होने के चलते उनकी फसलों की वाजिब कीमत नहीं मिल पाती। उन्होंने पहले प्रतीकात्मक रूप में सड़कों पर दूध, फल, सब्जियां फेंकी, पर सरकार ने उसे नजरअंदाज कर दिया। फिर वे आंदोलन पर उतरे तो उनके दमन का प्रयास किया गया। फिर मुख्यमंत्री खुद किसानों से मिलने नहीं गए। इसलिए उनके आश्वासन पर किसान कितना भरोसा कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। दरअसल, किसानों में गुस्सा सिर्फ नगदी फसलों की वाजिब कीमत न मिल पाने से नहीं है। भूमि अधिग्रहण कानून को लचीला बनाए जाने और मंदसौर, नीमच इलाके में औद्योगिक इकाइयों के विस्तार को मंजूरी देने की वजह से भी है। आंदोलन को बल पूर्वक दबाने की कोशिश के चलते अब किसानों की मांग व्यापक हो गई है। स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करने की मांग होने लगी है। भारतीय किसान यूनियन ने इसे लागू करने को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की घोषणा कर दी है।

सरकारें इस हकीकत से मुंह नहीं चुरा सकतीं कि किसान और किसानी की दशा सुधारने के लिए जैसी व्यावहारिक योजनाएं बननी चाहिए, वे अभी तक नहीं बन पाई हैं। सिंचाई के साधन, भंडारण, फसलों के मूल्य निर्धारण आदि को लेकर कोई पारदर्शी तंत्र नहीं विकसित हो पाया है। फसलें उगाने के लिए ज्यादातर किसान मानसून पर निर्भर रहते हैं, उसी तरह उन्हें बेचने के लिए बिचौलियों और आढ़तियों पर। कृषि ऋण और फसल बीमा के मामले में संबंधित महकमों का रवैया प्राय: भेदभावपूर्ण देखा गया है। कृषि ऋण महज एक फसल के लिए मिलता है, फिर समय पर न चुकाए जा सकने पर उसकी ब्याज दर किसानों के लिए बोझ बनती जाती है। इसी तरह नगदी फसलों का समर्थन मूल्य तय न होने की वजह से अक्सर मौसम की मार और भंडारण, बाजार तक पहुंचाने की सुविधा न होने आदि के चलते किसानों को उनमें घाटा उठाना पड़ता है। इसलिए स्वामीनाथन समिति के कृषि को रोजगारपरक बनाने, सिंचाई, भंडारण आदि की सुविधाएं मुहैया कराने संबंधी सुझावों पर अमल की मांग उठने लगी है। अगर केंद्र सरकार किसानों की मांग को गंभीरता से नहीं लेगी, तो उसके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

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