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किसान की आवाज

हर जगह किसानों की मूल समस्या यह है कि उन्हें उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। खेती घाटे का धंधा बन गई है। जब सूखे या ओला पड़ने से फसल मारी जाती है।

Author June 13, 2017 5:27 AM
महाराष्ट्र में किसानों के आंदोलन पर चल रही राजनीति आज तेज हो गई। शिवसेना के मंत्रियों ने राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में हिस्सा नहीं लिया।

महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश, दोनों सरकारों को किसानों के आंदोलन के आगे झुकना पड़ा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जहां किसानों के कर्जे माफ करने और दूध का भी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की घोषणा की है, वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषिऋण माफ करने का एलान तो नहीं किया, पर ब्याज माफ कर दिया और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद को अनिवार्य बनाने सहित कुछ दूसरे कदम उठाने का भरोसा दिलाया है। अट्ठाईस घंटे का अपना उपवास तोड़ने के बाद चौहान ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर किसी भी कृषि उत्पाद की खरीद को अपराध माना जाएगा; कृषिभूमि अब संबद्ध किसानों की सहमति से ही अधिग्रहीत की जाएगी; सभी नगर निगम इलाकों में किसान बाजार की स्थापना की जाएगी। दोनों राज्यों की सरकारें आंदोलन पर तरह-तरह की तोहमत मढ़ रही थीं, कि किसानों को भड़काया और बहकाया जा रहा है; किसानों के मुद््दे का कांग्रेस राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है, आदि। मध्यप्रदेश सरकार तो यहां तक चली गई कि पांच किसानों की मौत पुलिस की गोलियों से नहीं बल्कि उपद्रवियों की गोलियों से हुई। लेकिन केंद्र को राज्य की ओर से भेजी गई रिपोर्ट से साफ है कि पांचों किसान पुलिस फायरिंग में मारे गए।

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बहरहाल, दोनों सरकारों की घोषणाओं से आंदोलन की प्रासंगिकता ही रेखांकित हुई है। यों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पहले ही कृषिऋण माफी का वायदा कर चुके थे। पर अगर अमल न हो, तो वायदे से क्या होता है? वायदा तो भाजपा ने लोकसभा चुनाव के समय ही अपने घोषणापत्र में कर दिया था कि अगर वह सत्ता में आई तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करेगी, यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना ज्यादा दाम मिले। लेकिन सत्ता में आते ही इस वायदे को उसने भुला दिया, वरना किसान आज आंदोलन के लिए मजबूर न होते। हर जगह किसानों की मूल समस्या यह है कि उन्हें उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है। खेती घाटे का धंधा बन गई है। जब सूखे या ओला पड़ने से फसल मारी जाती है, तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, क्योंकि उसके पास बेचने को कुछ नहीं होता, मगर जब बंपर पैदावार होती है, तब भी खुद को ठगा हुआ महसूस करता है, क्योंकि उसे पैदावार का संतोषजनक दाम नहीं मिल पाता है। कई बार लागत भी नहीं निकल पाती है। कर्जमाफी की मांग इसी स्थिति की देन है।

कॉरपोरेट जगत के दिग्गजों से लेकर रिजर्व बैंक के गवर्नर और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ जब-तब कर्जमाफी के विरुद्ध आगाह करते रहते हैं। उनका यह कहना सही है कि किसानों की कर्जमाफी से सरकारी खजाने पर बुरा असर पड़ेगा। लेकिन वे तब क्यों चिंतित नजर नहीं आते, जब किसानों की कर्जमाफी से कई गुना राशि की रियायत कॉरपोरेट जगत को दे दी जाती है। और अब तो बैडलोन के नाम पर बड़े कॉरपोरेट कर्जों की एकमुश्त माफी की तजवीज की जा रही है। वे कृषि की चिंता करते भी हैं, तो बस विकास दर के लिहाज से। लेकिन कृषि की विकास दर से किसानों को क्या मिला है, यह मध्यप्रदेश के उदाहरण से जाहिर है, जो कुछ बरसों से देश में सर्वोच्च कृषि विकास दर वाला राज्य रहा है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र, दोनों राज्यों के किसान आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने कृषि उपज की कीमत के सवाल पर पूरे देश का ध्यान खींचा है और दूसरे राज्यों के किसानों में भी न्यायसंगत मूल्य के लिए आवाज उठाने का हौसला जगाया है।

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