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भय का माहौल

गोहत्या रोकने के नाम पर भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ पूरे देश से आवाजें उठने लगी हैं।
Author July 3, 2017 04:42 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर। (फाइल)

गोहत्या रोकने के नाम पर भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं के खिलाफ पूरे देश से आवाजें उठने लगी हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर लोगों ने धरना दिया। राष्ट्रपति ने भी इस पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि हमें बुनियादी सिद्धांतों के प्रति सजग रहना चाहिए। मगर केंद्र सरकार अब भी इसे लेकर गंभीर नजर नहीं आती। वह इन घटनाओं को कानून-व्यवस्था का मामला बताते हुए दोष राज्य सरकारों के मत्थे मढ़ कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त महसूस कर रही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गोवा में यह साबित करने की कोशिश की कि कांग्रेस के शासनकाल में ऐसी हिंसक घटनाएं अधिक हुईं। मगर हकीकत यह है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद गोरक्षा के नाम पर भीड़ के रूप में हमला कर लोगों को मार डालने की घटनाएं तेज हुई हैं। ऐसी घटनाएं उन राज्यों में अधिक हुई हैं, जहां भाजपा सत्ता में है। यह भी छिपी बात नहीं है कि इसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को अधिक निशाना बनाया जा रहा है। मगर प्रधानमंत्री सहित भाजपा के कुछ नेता इन घटनाओं पर महज रस्मी बयान देकर अपना कर्तव्य पूरा समझ लेते रहे हैं। कहीं भी उपद्रवियों में कानून का भय नजर नहीं आता।

उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद देशभर में विरोध के स्वर उभरे, मगर ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के उपाय तलाशने के बजाय उस पर परदा डालने का प्रयास अधिक हुआ। हर मसले पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री ने तब कुछ नहीं कहा। गुजरात में मरी गाय का चमड़ा उतारने ले जा रहे दलितों को पीट-पीट कर मार डाला गया तो एक बार फिर देशभर में रोष उभरा। उसके बाद प्रधानमंत्री ने जरूर गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों को कड़ी नसीहत दी थी, पर उसका कोई असर नहीं दिखाई दिया। अब स्थिति यह है कि गोरक्षा के नाम पर आए दिन हिंसा होने लगी है। इसके अलावा भी किसी न किसी बहाने अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। हरियाणा में रेवाड़ी के लोगों ने इस बार ईद नहीं मनाकर इस बात को रेखांकित किया कि वे निहायत असुरक्षित माहौल में जी रहे हैं। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर गोरक्षा के नाम पर उपद्रव को अनुचित बताया, पर उसका असर भी उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर नहीं दिख रहा। अमित शाह के इस बयान से भी भला उन्होंने क्या प्रभाव ग्रहण किया होगा कि भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाएं कांग्रेस के शासन में अधिक हुईं!

अब कई घटनाओं में भाजपा कार्यकर्ताओं के शामिल होने के प्रमाण सामने आ चुके हैं। हाल में झारखंड में हुई हत्या के मामले में भाजपा के एक जिम्मेदार नेता की गिरफ्तारी इसका ताजा उदाहरण है। इसके बावजूद अगर भाजपा आलाकमान इस बात पर परदा डालने का प्रयास कर रहे हैं कि उनके कार्यकर्ता ऐसे उपद्रवों में शामिल होते हैं और अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाते हैं, तो यह पार्टी की छवि के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। यह सही है कि गोरक्षा संबंधी कानून लगभग सभी राज्यों में बने हुए हैं, पर उनका पालन कराना राज्य सरकारों का दायित्व होना चाहिए, न कि कुछ संगठनों को अधिकार मिल जाता है कि वे भीड़ के रूप में इकट्ठा होकर हिंसा के जरिए इसका पालन कराएं। इस मामले में केंद्र सरकार को उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को कड़े शब्दों में हिदायत देने से क्यों गुरेज होना चाहिए।

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