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संकीर्णता की हदें

मुंबई में पिछले करीब दस दिनों से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बाहर से आकर बसे और कारोबार कर रहे लोगों के खिलाफ हिंसक आंदोलन चला रही है।

Author November 6, 2017 04:18 am
एमएनएस चीफ राज ठाकरे।

मुंबई में पिछले करीब दस दिनों से महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बाहर से आकर बसे और कारोबार कर रहे लोगों के खिलाफ हिंसक आंदोलन चला रही है। उसके कार्यकर्ता पटरी पर रेहड़ी लगाने वालों, फेरी वालों को मार-पीट रहे हैं, उन्हें वापस जाने को कह रहे हैं। इस बीच फेरीवालों के समर्थन में उतरे कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर भी मनसे कार्यकर्ताओं ने हिंसक हमले किए। पिछले महीने एक पुल के गिरने के बाद मनसे ने मुंबई पुलिस को चेतावनी दी थी कि अगर उसने बाहरी प्रांतों से आकर यहां फेरी लगाने, रिक्शा वगैरह चलाने वालों को हटाने की कार्रवाई नहीं की तो उसके कार्यकर्ता खुद यह काम करना शुरू कर देंगे। और वही हुआ। मनसे के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और फेरी, खोमचा लगाने वालों का सामान फेंकना, तोड़-फोड़ और उनके साथ मार-पीट करना शुरू कर दिया। हालांकि शिवसेना और मनसे के कार्यकर्ता ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं। चूंकि उनकी पूरी राजनीति मराठी अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के संकल्प से जुड़ी है, इसलिए वे मौका पाकर जब-तब बाहरी लोगों के खिलाफ हिंसक आंदोलन शुरू कर देते हैं। रविवार को मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने एक बार फिर यह कह कर अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और मराठी भावना को भुनाने का प्रयास किया कि जब तक बाहरी लोगों को यहां से भगा नहीं दिया जाता, महाराष्ट्र के लोगों को उनका हक हासिल नहीं हो पाएगा। इस क्रम में उन्होंने बाहरी लोगों का समर्थन कर रहे अभिनेता नाना पाटेकर को भी आड़े हाथों लिया।

दरअसल, जब से शिव सेना दोफाड़ हुई है, दोनों घटकों के बीच मराठी अस्मिता की राजनीति कुछ अधिक आक्रामक हुई है। मनसे अपने को शिव सेना से अधिक मराठी मानुस की हितैषी साबित करने की कोशिश करती है। कुछ महीने पहले राज ठाकरे ने इसी तरह बाहरी प्रदेशों से आकर मुंबई में रिक्शा चलाने वालों को बाहर खदेड़ने के लिए आंदोलन चलाया था। हालांकि अब महाराष्ट्र के लोग भी शिव सेना और मनसे की संकीर्ण राजनीति को समझ चुके हैं, इसलिए उनके आंदोलनों का बहुत असर नहीं दिखाई देता, पर हैरानी की बात है कि उनके कार्यकर्ताओं के खिलाफ कभी कड़े कदम नहीं उठाए जाते। किसी भी शहर या राज्य से बाहरी लोगों को खदेड़ना या परेशान करना संवैधानिक मूल्यों और संघीय ढांचे के विरुद्ध है। ऐसा नहीं कि यह बात शिव सेना और मनसे के लोग नहीं जानते, पर वे इसी तरह बाहुबल के आधार पर अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास करते आए हैं, इसलिए यह उनका राजनीति करने का एक ढर्रा बन चुका है।

पिछली विधानसभा में जबसे भाजपा ने अपने दम पर चुनाव जीता और सरकार बनाई है, शिव सेना और मनसे एक तरह से अलग-थलग पड़ गई हैं। उन्हें अपना जनाधार बढ़ाने की चिंता सताने लगी है, इसलिए भी वे जब-तब कभी सरकार को घेरने के मकसद से, तो कभी मराठी भावना को भुनाने की मंशा से अपने कार्यकर्ताओं को उपद्रव के लिए उकसाती रहती हैं। पर इस हकीकत से उन्हें आंख नहीं चुराना चाहिए कि जिस दमखम और रणनीति के तहत बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में अपना सिक्का जमाया था, अब उसे शिव सेना और मनसे के लिए बहुत देर तक भुनाना संभव नहीं है। विधानसभा और फिर कुछ नगर निकाय चुनावों में महाराष्ट्र के लोग इस बात का संकेत भी दे चुके हैं। इसलिए संघीय ढांचे को क्षत-विक्षत करने के बजाय अगर वे स्वस्थ राजनीतिक मुद्दों पर अपना जनाधार मजबूत करने का प्रयास करें तो शायद वे अपने अस्तित्व को बचाए रख सकती हैं।

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