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सजा और संदेश

इस सजा से एक कड़ा संदेश उन लोगों के बीच जाएगा, जो नासमझी में या जानबूझ कर या किसी और के उकसावे में देश-विरोधी गतिविधियों और आतंकी कार्रवाइयों में लगे रहते हैं।

Author March 1, 2017 2:53 AM
सिमी के मुखिया सफदर नागोरी के खिलाफ उज्‍जैन के महाकाल पुलिस थाने में 1997 में एक मुकदमा दर्ज किया गया था।

भारत लंबे अरसे से बाहरी और भीतरी आतंकवाद से पीड़ित है। ऐसे वक्त में इंदौर की एक सीबीआई अदालत ने प्रतिबंधित संगठन ‘सिमी’ (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया) के पूर्व प्रमुख सफदर नागौरी समेत ग्यारह लोगों को देशद्रोह के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई है। समझा जाता है कि इस सजा से एक कड़ा संदेश उन लोगों के बीच जाएगा, जो नासमझी में या जानबूझ कर या किसी और के उकसावे में देश-विरोधी गतिविधियों और आतंकी कार्रवाइयों में लगे रहते हैं। सिमी अपने आप को इस्लामिक उसूलों का अलंबरदार होने का दावा करता रहा है और भारत विरोधी गतिविधियों के तमाम मामलों में उसका हाथ पाया गया था। इसी वजह से उस पर केंद्र सरकार ने 2001 में पहली बार प्रतिबंध लगाया था। जिस मामले में इन ग्यारह अभियुक्तों को सजा दी गई है, उसमें इन पर देशद्रोह करने, भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने, विधि विरुद्ध क्रियाकलाप करने और अवैध हथियार रखने आदि के आरोप शामिल हैं। पैंतालीस वर्षीय नागौरी समेत दस मुजरिम गुजरात के साबरमती जेल में हैं। इन्हें वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए फैसले की जानकारी दी गई।

चौरासी पेज के फैसले में सीबीआई के विशेष जज ने कहा कि अभियुक्तों का देश के संविधान में भरोसा नहीं है। ऐसे लोग मुल्क की एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं। ये धार्मिक आधार पर घृणा फैला कर गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त हैं। इनका लक्ष्य मानवता को गहरी चोट पहुंचाना था। उन्हें कोई राहत नहीं दी जा सकती। अभियोजन पक्ष ने इस मामले में सत्ताईस गवाह पेश किए थे। अदालत ने कहा कि सुनवाई के दौरान सिमी सदस्यों का दूसरे आतंकी नेटवर्क से भी संबंध साबित हुआ है। यह बात भी सामने आई कि सिमी आतंकी कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते। इन लोगों को 2008 में इंदौर के दो अलग-अलग ठिकानों से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने इनके कब्जे से आपत्तिजनक साहित्य, विस्फोटक सामग्री, जिलेटिन रॉड, आडियो-वीडियो सामग्री, डेटोनेटर, सीडी, देसी रिवाल्वर, जिंदा कारतूस आदि जब्त किए थे।

सजायाफ्ता आतंकियों में चार-चार आतंकी मध्यप्रदेश और कर्नाटक तथा तीन केरल के हैं। यों तो इन्हें अलग-अलग मामलों में अलग-अलग सजाएं सुनाई गई हैं, लेकिन सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। हालांकि, बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि फैसले में कई खामियां हैं और कानूनी आधार ार इसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाएगी। यह सही कि हर किसी को ऊपरी अदालत में अपील करने का अधिकार है। ऐसे में अगर इस मामले में दोषी पाए गए अभियुक्त भी ऊपरी न्यायालय में अपील करते हैं तो यह स्वाभाविक ही है। फिलहाल, सीबीआई अदालत ने जो फैसला किया है, वह काफी सुविचारित है। हर दंड के पीछे कोई न कोई संदेश भी जरूर छिपा रहता है। निश्चित रूप से इस फैसले का भी एक संदेश है। ऐसे लोग, जो लगातार भारत को खंडित करने और उसे हिंसा से कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि कानून के हाथ सचमुच ही लंबे होते हैं और उससे बचना आसान नहीं होता। इस कारण भी यह निर्णय कहीं ज्यादा महत्त्व का है।

 

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