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संपादकीय: पाक की बौखलाहट

घाटी के आम लोग खून-खराबे के बजाय बातचीत के जरिए हल तलाशने के हिमायती हैं।

Author September 8, 2016 2:25 AM
कश्‍मीर में प्रदर्शन के दौरान अभी तक 30 लोग जान गंवा चुके हैं। (Photo: AP)

जब भी भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद का मसला उठा कर पाकिस्तान को घेरने की कोशिश करता है, उसकी बौखलाहट बढ़ जाती है। नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन और भारतीय उच्चायुक्त गौतम बंबावले का कार्यक्रम रद्द करना पाक अधिकारियों की इसी बौखलाहट का नतीजा है। एक हफ्ते से भी कम समय में पाकिस्तानी सेना ने दो बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है। अक्सर इस तरह की हरकतें पाक सेना भारतीय सैनिकों को उकसाने या फिर आतंकियों की घुसपैठ कराने के मकसद से करती है। पिछले महीने भी अपने ऐन जश्ने-आजादी वाले दिन उसने संघर्ष विराम का उल्लंघन किया था। दरअसल, इस तरह वह कश्मीर में चल रही अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। हुर्रियत नेता इन दिनों नजरबंद हैं। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल उनसे बात करने पहुंचा, तो उन्होंने सामान्य शिष्टाचार निभाना भी जरूरी नहीं समझा। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर जाने से वहां के लोगों में भरोसा बना है कि उनकी समस्या के हल के लिए सारे दल साथ हैं।

हकीकत यह भी है कि घाटी के आम लोग खून-खराबे के बजाय बातचीत के जरिए हल तलाशने के हिमायती हैं। ऐसे में हुर्रियत नेताओं के प्रति नकारात्मक रुख बना है। पाकिस्तान को इसकी भी कसक है। कश्मीर एक ऐसा मसला है, जिसे पाकिस्तान हर वक्त भुनाना चाहता है। इसीलिए जब भारत के उच्चायुक्त बंबावले ने एक बैठक में कह दिया कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है और पाकिस्तान को उसमें बेवजह नहीं पड़ना चाहिए, वह पहले अपनी समस्याएं सुलझाने पर ध्यान दे, तो पाकिस्तान की भौहें तन गर्इं।

पिछले बीस दिनों में भारत की तरफ से जो कूटनीतिक कदम उठाए गए, उनसे पाकिस्तान की परेशानी बढ़ गई है। लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन का मसला उठा दिया। फिर जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में उन्होंने बिना नाम लिए पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी संगठनों की तरफ इशारा किया। उधर अमेरिका से भारत की नजदीकी लगातार बढ़ रही है। इसलिए भी पाकिस्तान कश्मीर के मसले पर भारत को उलझाए रखना चाहता है। मगर उसकी इन हरकतों से भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला। उसकी रणनीति कश्मीर में अलगाववादी और कट््टरपंथी ताकतों को अलग-थलग करने की होनी चाहिए।

इस मामले में केंद्र के सारे दल साथ हैं, जम्मू-कश्मीर में भी विपक्षी दल राजनीतिक पहल के जरिए अमन का रास्ता तलाशने के हिमायती हैं। ऐसे में केंद्र सरकार अगर कश्मीर को लेकर कोई व्यावहारिक नीति बनाने और लगातार घाटी के लोगों का भरोसा जीतने का प्रयास करती है, तो पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेरना मुश्किल नहीं। केंद्र ने हुर्रियत नेताओं को सरकार की तरफ से मिलने वाली मदद और उनकी आमदनी वगैरह पर नजर रखने का विचार बनाया है। यह उन पर नकेल कसने का एक उपाय हो सकता है, पर इस मामले में हर कदम बहुत सावधानी से उठाने की जरूरत है। अलगाववादियों के खिलाफ एकदम से कोई कड़ा उठाना पाकिस्तान को लाभ पहुंचा सकता है। छिपी बात नहीं है कि ये अलगाववादी नेता पाकिस्तान की शह पर घाटी में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करते हैं। सही तरीके से पहल हो तो शायद उदारवादी अलगाववादी धड़े बातचीत की मेज पर जल्दी आ बैठेंगे। बड़ा खतरा घाटी में जड़ें जमा रहे कट््टरपंथी इस्लामी संगठनों से पैदा हो गया है। उन पर नकेल कस कर पाकिस्तान को काफी हद तक कमजोर किया जा सकता है।

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