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दावे और हकीकत

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने पिछले दिनों अपनी सरकार के सौ दिनों का रिपोर्ट कार्ड जारी किया, तो उसमें कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भारी कामयाबी का दावा था। पर यह आत्म-प्रशंसा खोखली जान पड़ती है।
Author July 3, 2017 04:49 am
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ।(फोटो: PTI)

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कानून-व्यवस्था को एक बड़ा मुद््दा बनाया था। भाजपा ने मायावती और अखिलेश यादव की सरकारों पर जंगल राज का आरोप मढ़ते हुए यह वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो फौरन कानून व्यवस्था को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। लेकिन तीन महीने से ऊपर हो गए, आज हकीकत क्या है? यों मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने पिछले दिनों अपनी सरकार के सौ दिनों का रिपोर्ट कार्ड जारी किया, तो उसमें कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भारी कामयाबी का दावा था। पर यह आत्म-प्रशंसा खोखली जान पड़ती है। अपराधियों का हौसला किस कदर बढ़ा हुआ है, इसका ताजा संकेत बिजनौर की एक घटना से मिल जाता है, जिसमें बीते शुक्रवार की रात अज्ञात अपराधियों ने एक सब इंस्पेक्टपर की गला रेत कर हत्या कर दी, उनका शव गन्ने के एक खेत में फेंक दिया और उनकी सर्विस रिवाल्वर लेकर भाग गए। राज्य सरकार कह सकती है कि उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा है और किसी एक-दो वारदात से उसके कामकाज का आकलन नहीं किया जा सकता। पर इससे पहले की भी, दिल दहला देने वाली घटनाओं को याद करें। एक पेट्रोल पंप के मालिक को लूटा जाना, एक व्यापारी की हत्या, दो लड़कियों समेत एक परिवार के चार सदस्यों की धारदार हथियार से हत्या, गहने की दुकान में डकैती, एक राजनीतिक की हत्या, एक पुलिस सब इंस्पेक्टर को खुलेआम पीटा जाना। सहारनपुर में जातिगत टकराव व हिंसा। गोरक्षा के नाम पर उत्पात व हिंसा। इस सिलसिले पर विराम कब लगेगा?

मुख्यमंत्री ने पदभार संभालते ही हर पुलिस अधीक्षक को सुबह नौ बजे तक दफ्तर पहुंच जाने, रोज कम से कम एक थाने का निरीक्षण करने जैसे कई निर्देश जारी किए थे। यही नहीं, खुद थाने का औचक निरीक्षण करके उन्होंने यह संदेश भी देना चाहा कि पुलिस महकमे के कामकाज पर उनकी सीधी नजर है। यों भी गृह मंत्रालय की कमान उन्होंने अपने ही हाथ में रखी है। फिर क्या वजह है कि एक तरफ आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी और दूसरी तरफ पुलिस के इकबाल में कमी आई दिखती है? मुख्यमंत्री ने पहले तय किया था कि वे पुलिस अफसरों के तबादले नहीं करेंगे, क्योंकि इससे बदले की कार्रवाई के तौर पर देखा जाएगा। मगर फिर थोक में ताबड़तोड़ तबादले किए गए। नए हलके को समझने और तालमेल बिठाने में पुलिस अफसरों को कुछ वक्त लगेगा, और हो सकता है अपराधी इसका फायदा उठा रहे हों। लेकिन थोक में तबादला क्या सोच कर किया गया?

पुलिस के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप की शिकायत पुरानी है, और इसी के मद््देनजर सोली सोराबजी समिति ने वरिष्ठ पुलिस अफसरों का कम से कम दो साल तक तबादला न करने और उनकी पदोन्नति, निलंबन आदि के लिए एक स्वायत्त बोर्ड बनाने की सिफारिश की थी। सोराबजी समिति की सिफारिशें, सर्वोच्च न्यायालय की कई बार की हिदायत के बावजूद, राज्य सरकारों ने लागू नहीं होने दीं। पर उत्तर प्रदेश के मामले में सबसे खटकने वाली बात यह है कि पुलिस अफसरों के काम में राजनीतिक दखलंदाजी के अलावा पुलिसकर्मियों पर हमले की भी कई घटनाएं हुई हैं, और कई मामलों में आरोप राजनीतिकों पर हैं। सहारनपुर में एसएसपी के निवास को घेर लेने वाली भीड़ को खुद वहां मौजूद रह कर उकसाने का आरोप सत्तारूढ़ पार्टी के एक सांसद पर ही लगा था। क्या इसी तरह से भाजपा उत्तर प्रदेश को भयमुक्त बनाना चाहती है!

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  1. शाहिद
    Jul 4, 2017 at 11:05 pm
    हांथी के दांत दिखाने के और, खाने के और ।
    (0)(0)
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