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विदाई और संदेश

इसी तरह उन्होंने शिक्षा की अहमियत को रेखांकित करते हुए भी खुले विचार-विमर्श और वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को आज का अनिवार्य कर्तव्य बताया और समाज के अंतिम व्यक्ति की भागीदारी को विकास की कसौटी कहा।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

 

प्रणब मुखर्जी ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन देशवासियों के नाम अपने संबोधन में जो कुछ कहा वह आज देश का सरोकार होना चाहिए। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, पर यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने किसे क्या नसीहत दी। अपने विदाई संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है; भारत केवल एक भौगोलिक सत्ता नहीं है; सहृदयता और समानुभूति की क्षमता हमारी सभ्यता की सच्ची नींव रही है; लेकिन हम देख रहे हैं कि इन दिनों हमारे आसपास हिंसा बढ़ रही है, जिसकी जड़ में अज्ञान, भय और अविश्वास है; हमें अपने जनसंवाद को शारीरिक और मौखिक, सभी तरह की हिंसा से मुक्त करना होगा। आखिर ये सब बातें याद दिलाने की जरूरत उन्होंने क्यों महसूस की? इसीलिए कि धीरे-धीरे एक डर जो चारों तरफ घुलता जा रहा है, वह घोर चिंता का विषय है। ऐसे माहौल में न संस्थाओं की स्वायत्तता बची रह सकती है न नागरिक अधिकार अक्षुण्ण रह सकते हैं। प्रणब मुखर्जी ने उचित ही इस ओर ध्यान खींचा कि संस्कृति, पंथ और भाषा की विविधता ही भारत कोविशेष बनाती है; और हमारे बहुलवादी समाज का निर्माण सदियों से विचारों को आत्मसात करने की प्रवृत्ति के चलते हुआ है। जाहिर है, अगर इससे विपरीत दिशा में हम चलते हैं तो भारत की सबसे मूल्यवान थाती और अपनी महान सभ्यता के आधार को ही गंवा बैठेंगे।

इसी तरह उन्होंने शिक्षा की अहमियत को रेखांकित करते हुए भी खुले विचार-विमर्श और वैज्ञानिक मनोवृत्ति को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को आज का अनिवार्य कर्तव्य बताया और समाज के अंतिम व्यक्ति की भागीदारी को विकास की कसौटी कहा। लेकिन उनके संबोधन में कुछ नसीहत खासतौर से राजनीतिकों के लिए थी। पारदर्शिता और जवाबदेही को सुशासन का मूलमंत्र बता कर और कमजोर तबकों के लाभान्वित होने को विकास का पैमाना कह कर उन्होंने जहां सत्तापक्ष को एक जरूरी संदेश दिया, वहीं संसद के कामकाज को बार-बार बाधित करने, हंगामा करने की प्रवृत्ति की आलोचना करके विपक्ष को भी सकारात्मक होने का पाठ पढ़ाया। इन बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। प्रणब मुखर्जी के विदाई संदेश की जिस बात ने सबसे अधिक ध्यान खींचा वह थी अध्यादेश का अपवादस्वरूप ही इस्तेमाल करने की सलाह। तो क्या वे अपना मलाल जाहिर कर रहे थे कि उन्हें कई बार तब भी अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने पड़े जब उसकी जरूरत नहीं थी?

याद करें, भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून को बदलने के लिए राजग सरकार ने तीन बार अध्यादेश जारी किया था। आखिरकार, देश भर में किसान संगठनों के विरोध के चलते उसे अध्यादेश की जगह विधेयक लाने का इरादा सरकार ने छोड़ दिया। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने का केंद्र का फैसला भी खासे विवाद का विषय बना था। इन दोनों राज्यों में राष्ट्रपति शासन को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक ठहराया। केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह और सिफारिश पर काम करने की संवैधानिक बाध्यता के कारण राष्ट्रपति को ऐसे निर्णयों को भी मंजूरी देनी पड़ी थी। पर अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने खुशी-खुशी इन पर हस्ताक्षर नहीं किए होंगे। लेकिन अगर एक बार उन्होंने पुनर्विचार के लिए प्रस्ताव सरकार को लौटा दिया होता, तो शासन की जिस मर्यादा और लोकतंत्र के जिन तकाजों की बात वे आज कर रहे हैं उनकी तरफ देश के लोगों का ध्यान कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से आकर्षित हुआ होता।

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