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संपादकीयः विकास के तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दिन के जम्मू-कश्मीर दौरे का संदेश स्पष्ट था। सरकार राज्य के विकास को लेकर संजीदा और तत्पर है। प्रधानमंत्री ऐसे वक्त गए जब रमजान के मद्देनजर सैन्य अभियान स्थगित कर दिया गया है।

Author May 21, 2018 3:56 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दिन के जम्मू-कश्मीर दौरे का संदेश स्पष्ट था। सरकार राज्य के विकास को लेकर संजीदा और तत्पर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दिन के जम्मू-कश्मीर दौरे का संदेश स्पष्ट था। सरकार राज्य के विकास को लेकर संजीदा और तत्पर है। प्रधानमंत्री ऐसे वक्त गए जब रमजान के मद्देनजर सैन्य अभियान स्थगित कर दिया गया है। केंद्र के इस कदम का स्वाभाविक ही सब तरह स्वागत हुआ। इसके बाद प्रधानमंत्री का दौरा राज्य के लोगों का भरोसा जीतने का एक और आयाम था- विकास का आयाम। इसी के साथ उन्होंने राज्य के गुमराह युवाओं का आह्वान किया कि वे हिंसा छोड़ अपने घरों को लौट आएं और शांति व गरिमा का जीवन जीएं। यह भी गौरतलब है कि प्रधानमंत्री राज्य के तीनों क्षेत्रों में गए और तीन बड़ी परियोजनाओं की नींव रखी। इनमें से एक है, तीन सौ तीस मेगावाट की किशनगंगा जलविद्युत परियोजना। यह परियोजना भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रही है, इसलिए इसका उद्घाटन भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी मायने रखता है। झेलम की सहायक नदी किशनगंगा पर 5,750 करोड़ की यह परियोजना पिछले दो माह में कई चरणों में शुरू हुई। दूसरी अहम परियोजना है श्रीनगर रिंग रोड। बयालीस किलोमीटर लंबा बनने जा रहा यह रिंग रोड राज्य में परिवहन को सुगम और तेज करने की दिशा में एक अहम शुरुआत है।

आवाजाही की सहूलियत बढ़ाने वाली एक और परियोजना शनिवार को शुरू हुई और वह है जोजिला सुरंग। यह एशिया का सबसे लंबा सुरंग-मार्ग होगा। यह दो दिशाओं में ले जाएगा और यह जम्मू, श्रीनगर, कारगिल और लेह को जोड़ने में यानी उनके बीच आवाजाही बारहो महीने कायम रखने में मददगार होगा। जोजिला दर्रा साढ़े ग्यारह हजार फुट की ऊंचाई पर है। सर्दियों में यह भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता है। इसके फलस्वरूप लद्दाख क्षेत्र का कश्मीर से संपर्क टूट जाता है। सुरंग बन जाने पर दोनों क्षेत्रों के बीच यह संपर्क-बाधा खत्म हो जाएगी। यही नहीं, जोजिला दर्रा पार करने में अभी साढ़े तीन घंटे का वक्त लगता है। सुरंग मार्ग बन जाने पर वह दूरी पंद्रह मिनट में ही तय की जा सकेगी। कोई पच्चीस हजार करोड़ रु. की इन परियोजनाओं के उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री ने श्रीनगर में शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में हुए समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि विकास ही सभी समस्याओं का समाधान है। लेकिन सवाल है कि क्या केंद्र के इस रुख का अपेक्षित परिणाम दिख रहा है? क्यों वाजपेयी सरकार को विकास-योजनाओं के अलावा ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ का खयाल रखने का भरोसा दिलाना पड़ा था?

यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सड़क, बिजली आदि ही काफी नहीं है, कश्मीरियों का भरोसा जीतने की भी जरूरत है। सच तो यह है कि पीडीपी-भाजपा सरकार बनी, तो उसने भी अपने ‘गठबंधन के एजेंडे’ में राज्य के इस विशिष्ट तकाजे को स्वीकार किया था, और कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण व स्थायी समाधान के लिए सभी पक्षों से संवाद का आश्वासन दिया था। लेकिन जिस सरकार से जम्मू व कश्मीर के बीच लंबे समय से बनी हुई मानसिक खाई पाटने की उम्मीद की गई थी, उसी सरकार के कार्यकाल में यह खाई और चौड़ी हो गई दिखती है। काफी वक्त गंवाने के बाद एक वार्ताकार की नियुक्ति की गई, पर उनकी कोई खास सक्रियता या उपलब्धि अब तक सामने नहीं आई है। जम्मू-कश्मीर में रोजगार के नए अवसर पैदा करने और विकास के तार जोड़ने जरूरी हैं, पर विश्वास के कुछ पुल भी बनाने होंगे।

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