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संपादकीय: सकारात्मक पहल

केंद्र पैलेट गन का विकल्प तलाशने पर राजी हो गया है। इस मौके पर गृहमंत्री ने एक बार फिर दोहराया कि राज्य के सभी समूहों से बातचीत के लिए केंद्र तैयार है।

Author August 26, 2016 1:11 AM
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के दो दिन के कश्मीर दौरे को घाटी में सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में केंद्र की एक सकारात्मक और गंभीर पहल कहा जा सकता है। यह इस बात की स्वीकृति भी है कि घाटी के हालात को कानून-व्यवस्था के नजरिए से ही नहीं, वहां के लोगों का भरोसा अर्जित करने के तकाजे से भी देखना होगा। एक महीने के भीतर राजनाथ सिंह का यह दूसरा कश्मीर दौरा था। दूसरे दौरे को इस तथ्य से भी जोड़ कर देखना होगा कि पिछले दिनों राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में वहां के विपक्षी दलों के एक प्रतिनधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर कश्मीर समस्या का राजनीतिक हल निकालने की गुजारिश की थी। ‘राजनीतिक समाधान’ एक ऐसा मुहावरा है जिसका अलग-अलग पक्ष अलग-अलग अर्थ करते हैं। पर इसकी प्रक्रिया की बाबत आम धारणा यही है कि बातचीत का दौर शुरू हो तथा जायज गले-शिकवे दूर किए जाएं। राजनाथ सिंह के श्रीनगर जाने का मकसद जहां हालात का जायजा लेना और सुरक्षा की स्थिति की समीक्षा करना था, वहीं भरोसा बहाली की पहल करना भी। इसलिए श्रीनगर पहुंचने से पहले ही उन्होंने उन सभी लोगों को मिलने का न्योता दिया, जो कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत में यकीन करते हैं। इ

सी फार्मूले की बिना पर वाजपेयी सरकार ने विभिन्न राजनीतिकों के अलावा कश्मीर के सभी समुदायों और सभी समूहों से बातचीत की प्रक्रिया चलाई थी। मौजूदा परिस्थितियों में, जब अशांति और कर्फ्यू लगातार जारी हो, वह बहुत कठिन मालूम पड़ता है, पर उसकी तैयारी दिखानी होगी। घाटी के हालात में मामूली सुधार कहा जा सकता है, पर कुल मिलाकर स्थिति अब भी बहुत विकट है। कर्फ्यू लगे डेढ़ महीना हो गया है और अधिकांश इलाकों में कर्फ्यू अब भी जारी है। मरने वालों की तादाद उनहत्तर और घायल होने वालों की तादाद दस हजार से ऊपर पहुंच गई है। इसलिए कश्मीर पर दुनिया भर की नजर है और कोई भी सरकार इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती। राजनाथ सिंह ने श्रीनगर पहुंच कर जहां सेना और अर्धसैनिक बलों के अफसरों से बात कर स्थिति की समीक्षा की, वहीं वे राजनीतिकों से भी मिले और नागरिक समाज के नुमाइंदों से भी। फिर, गुरुवार को राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और राजनाथ सिंह ने संयुक्त रूप से संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर यह भरोसा दिलाया कि घाटी में जल्द से जल्द स्थिति सामान्य बनाने के लिए केंद्र और राज्य मिल कर प्रयास कर रहे हैं।

केंद्र पैलेट गन का विकल्प तलाशने पर राजी हो गया है। इस मौके पर गृहमंत्री ने एक बार फिर दोहराया कि राज्य के सभी समूहों से बातचीत के लिए केंद्र तैयार है। यों यह कोई नई बात नहीं है; पीडीपी और भाजपा ने अपने गठबंधन का जो एजेंडा स्वीकार और घोषित किया था उसमें यह बात प्रमुखता से शामिल थी। पर सबसे बातचीत की जाएगी, यह बात तभी क्यों दोहराई जाती है जब अप्रत्याशित रूप से हालात बिगड़ गए होते हैं? ‘गठबंधन का एजेंडा’ अगर राजनीतिक आडंबर भर नहीं है, तो गठबंधन इसके अनुरूप कदम उठाने में क्यों नाकाम रहा है? इसमें बाधा कहां है? अगर केंद्र सरकार कहती है कि वह घाटी के सभी तरह के प्रतिनिधियों से बात करने को तैयार है, तो पहले उसे खुद को टटोलना चाहिए कि उसमें इस इरादे पर टिके रहने और उसे आगे बढ़ाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कितनी है।

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