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रोग के रसायन

खबरों के मुताबिक इस हादसे की वजह अंगूर के बगानों में छिड़काव शुरू करने से पहले एक विशेष रसायन की मात्रा को बढ़ा दिया जाना था। एक पखवाड़े के भीतर सामने आर्इं ये घटनाएं लापरवाही का नतीजा भी हो सकती हैं।

प्रतिकात्मक तस्वीर।

हाल ही में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले से खबर आई थी कि खेत में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान उसके संपर्क में आने की वजह से इक्कीस किसानों की जान चली गई। अब महाराष्ट्र के ही सोलापुर जिले में भी छिड़काव करते समय विषैले रसायनों की चपेट में आकर सात किसान गंभीर रूप से बीमार हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इनमें से चार की हालत गंभीर है। खबरों के मुताबिक इस हादसे की वजह अंगूर के बगानों में छिड़काव शुरू करने से पहले एक विशेष रसायन की मात्रा को बढ़ा दिया जाना था। एक पखवाड़े के भीतर सामने आर्इं ये घटनाएं लापरवाही का नतीजा भी हो सकती हैं। लेकिन ये वाकये इस कड़वी हकीकत की ओर भी इशारा करते हैं कि खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल कहां तक पहुंच गया है।

कीटनाशकों के बारे में विज्ञापनों में बढ़-चढ़ कर दावे किए जाते हैं। मसलन, सोलापुर में किसानों को यही पता था कि बादल छाए रहने से पौधे कमजोर होते हैं और रसायन की मात्रा बढ़ाने से फायदा होगा। इसी तरह, यवतमाल में यह बताया गया कि एक खास कीटनाशक से कीड़े खत्म हो जाएंगे और फसल लहलहा उठेगी। खेती में अनिश्चितता ज्यों-ज्यों बढ़ती जा रही है, किसानों का ऐसे प्रचार के प्रभाव में आ जाना स्वाभाविक है। जबकि कीटनाशक बेचने वाली कंपनियों को सिर्फ इस बात से मतलब होता है कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जाए लिहाजा, वे इसके प्रचार में बढ़ा-चढ़ा कर दावे करती हैं और खतरों के बारे में चुप्पी साध लेती हैं। लेकिन अफसोस की बात यह भी है कि प्रशासन या संबंधित महकमों को यह जरूरी नहीं लगता कि वे ऐसे प्रचार पर लगाम लगाएं और किसानों को इनके इस्तेमाल के प्रति सावधान करें। जहरीले रसायनों के मद््देनजर प्रयोग के दौरान एप्रन पहनने, शरीर की सुरक्षा के लिए उसे पूरी तरह ढकने जैसे कोई उपाय नहीं करना आम है। ऐसे कई रसायन हैं जो सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंच कर या फिर खुले शरीर पर सीधे गंभीर असर डालते हैं। मगर सुरक्षात्मक उपाय न अपनाने से कीटनाशक छिड़कने वाले व्यक्ति को आमतौर पर बीमार होते देखा गया है।

खतरनाक रसायनों की समझ नहीं होने से किसानों की जान जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। हालांकि डॉक्टर और वैज्ञानिक अक्सर यह चेतावनी देते रहे हैं कि रसायनों के असर में आने वाले लोगों में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इसके अलावा सिरदर्द, त्वचा रोग, अल्सर जैसे रोगों में भी तेजी दर्ज की जा रही है। भारत के कई राज्यों में कीटनाशकों के इस्तेमाल के चलते लाखों लोग स्थायी रूप से दमा, साइनस, एलर्जी और प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी हालत के शिकार हो चुके हैं। मगर इन सब बातों को लेकर शायद ही कोई जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं। जाहिर है, समस्या जितनी किसानों या साधारण लोगों के बीच जागरूकता की कमी की वजह से गहरा रही है, उससे ज्यादा यह उन सरकारी महकमों की लापरवाही का नतीजा है जिन्हें कीटनाशक तैयार करने और बेचने वालों की ओर से किए गए प्रचार और जहरीले रसायनों के बेलगाम इस्तेमाल पर नियंत्रण रखना जरूरी नहीं लगता।

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