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संपादकीय: संधि और घेराबंदी

सीधे युद्ध को न्योता देना न तो समझदारी भरा कदम होगा न व्यावहारिक।

Author September 28, 2016 4:13 AM
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (Source: PTI)

उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद से यह विचार मंथन जारी है कि भारत क्या-क्या कर सकता है। यों सैन्य कार्रवाई की मांग भी हुई, पर जल्दी ही साफ हो गया कि सीधे युद्ध को न्योता देना न तो समझदारी भरा कदम होगा न व्यावहारिक। इसके पीछे दो मोटे कारण नजर आए। एक तो यह कि भारत की तरह पाकिस्तान भी एटमी हथियार से लैस है। दूसरा, युद्ध से आर्थिक विकास बाधित होगा और खासकर विदेशी निवेशकों के बीच गलत संदेश जाएगा। यह इल्म होते ही इस पर विचार होने लगा कि दूसरे क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं। एक प्रमुख सुझाव यह आया कि भारत अगर सिंधु जल संधि को खत्म कर दे, तो पाकिस्तान के लिए त्राहि-त्राहि के हालात पैदा हो जाएंगे।

वैसी सूरत में भारत उस पर मनचाहा दबाव डाल सकेगा। इस सुझाव पर भारत सरकार का निर्णायक रुख क्या होगा, फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। पर दो बातों से सरकार ने सिंधु जल संधि की समीक्षा के संकेत दिए हैं। एक, प्रधानमंत्री का यह कहना कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। दूसरा, संधि की समीक्षा के लिए एक अंतर-मंत्रालयी कार्यबल के गठन का प्रधानमंत्री का फैसला। कार्यबल इस बात की पड़ताल करेगा कि यह समझौता अब कारगर है या नहीं। लेकिन छप्पन वर्षों से चल रही इस संधि के कारगर होने, न होने का सवाल अचानक कहां से आ गया? सब जानते हैं कि असल मुद््दा पाकिस्तान को घेरने का है। सितंबर 1960 में हुई संधि के मुताबिक पूर्वी तीन नदियों व्यास, रावी और सतलुज का नियंत्रण भारत को दिया गया, और पश्चिमी तीन नदियों सिंधु, चिनाब और झेलम पर नियंत्रण पाकिस्तान को। तीन युद्धों के बावजूद, और उनके दरम्यान भी, यह संधि निरंतर बरकरार रही है। लेकिन अब यह कहने वाले कई लोग निकल आए हैं कि यह संधि पूरी तरह पाकिस्तान की तरफ झुकी हुई और भारत को इससे कोई फायदा तो दूर, उलटे नुकसान है, और भारत को जल्दी से जल्दी इस संधि को खत्म कर देना चाहिए। ऐसा कहने वाले यह भी कहते हैं कि सिंधु संधि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जरूरत से ज्यादा दरियादिली का नतीजा थी। लेकिन ऐसे लोग भूल जाते हैं कि यह संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता के फलस्वरूप हुई और एक-एक पहलू पर कई बरस तक गहन चर्चाएं हुई थीं।

सरकार को भी यह अहसास है कि इस संधि को तोड़ना आसान नहीं होगा। एक तो इसलिए कि ऐसा करने पर भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को धक्का लगेगा। संधि के टूटने पर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय पंचाट में जा सकता है। क्या भारत पंचाट के फैसले को न मानने की हद तक जाएगा? संधि के टूटने पर कई सारे नए विवाद पैदा होंगे। चीन से भी कई नदियां भारत आती हैं। अगर चीन भी वैसा ही व्यवहार करेगा, तो भारत किस मुंह से उसे अन्याय ठहराएगा? नेपाल और बांग्लादेश भी भारत को लेकर सशंकित हो सकते हैं, जिनके साथ नदियों के जल बंटवारे को लेकर भारत के समझौते हैं। पश्चिमी नदियों का पानी रोकने के लिए जो बांध और नहरें बनानी होंगी, उनके लिए एक तरफ विशाल खर्च की व्यवस्था करनी होगी और दूसरी तरफ विस्थापन की नई समस्या का सामना करना होगा। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि संधि के टूटने से दोनों तरफ पर्यावरणीय और मानवीय त्रासदी पैदा हो सकती है। क्या इससे आतंकवाद पर लगाम लगेगी? दरअसल, उड़ी हमले के मद््देनजर अपनी आंतरिक सुरक्षा को और मजबूत करने तथा दुनिया के सामने पाकिस्तान की जवाबदेही के लिए अधिक से अधिक कूटनीतिक दबाव डालने की जरूरत है।

 

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