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संघर्ष अविराम

आज भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जैसा घोर तनाव दिख रहा है, युद्ध के दिनों को छोड़ दें, तो शायद ही पहले कभी रहा हो।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर।

नियंत्रण रेखा के पार बंकर नष्ट करने का जो वीडियो सामने आया है माना जा रहा है कि वह भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई की बाबत है। वीडियो से पता चलता है कि सीमापार से संघर्ष विराम उल्लंघन होने पर भारतीय जवानों ने कड़ा जवाब दिया है। बंकर नष्ट करने की कार्रवाई बस साठ सेकेंड में पूरी हो गई और इसे एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल के जरिए अंजाम दिया गया। लेकिन दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि यह एक मई के उस बर्बर कांड का बदला था, जिसमें नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी फायरिंग में शहीद हुए दो भारतीय सैनिकों के सिर पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम ने काट दिए थे। वीडियो में दर्ज कार्रवाई की तारीख को लेकर अभी अनिश्चितता है। पर यह तो साफ है कि संघर्ष विराम के उल्लंघन की पाकिस्तान की आए दिन की हरकतों के कारण ही इस कार्रवाई की जरूरत महसूस की गई होगी। आज भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जैसा घोर तनाव दिख रहा है, युद्ध के दिनों को छोड़ दें, तो शायद ही पहले कभी रहा हो। भारत एक तरफ कश्मीर घाटी में दिनोंदिन और बिगड़ते हालात से हलकान है तो दूसरी तरफ घाटी में अलगाववाद को हवा देने तथा नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम को धता बताने वाली पाकिस्तान की कारगुजारियों से।

संघर्ष विराम समझौता नवंबर 2003 में हुआ था। तब देश में वाजपेयी सरकार थी। दोनों तरफ के सैन्य कार्रवाई महानिदेशकों को इस समझौते के अमल की जिम्मेवारी दी गई। शुरू के कुछ बरसों में इस समझौते की उपलब्धि साफ दिखती थी। समझौते से पहले के एक दशक की तुलना में समझौते के बाद के एक दशक के रिकार्ड को देखें, तो सीमा पर हिंसा की घटनाओं में काफी कमी दिखेगी। लेकिन पिछले तीन-चार साल से जैसा सिलसिला चला है उससे समझौते का दम निकल गया है। संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन की आवृत्ति इतनी अधिक हो चुकी है कि यह लगभग रोजाना की घटना हो गई है। किसी-किसी दिन तो यह क्रम चौबीस घंटे में कई-कई बार होता है। आरटीआइ के तहत दिए गए एक आवेदन के जवाब में गृह मंत्रालय की तरफ से मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक, 2015 में नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की चार सौ पांच घटनाएं सामने आर्इं और 2016 में चार सौ उनचास। इन घटनाओं के चलते सरहद से लगे इलाकों में खासकर दो साल से बड़े भयावह हालात हैं। कई नागरिक गोलाबारी की चपेट में आकर मारे गए हैं। काफी ज्यादा तादाद में पशुओं की जान गई है। लोग अपने गांव-घर छोड़ कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में पलायन करने को विवश हुए हैं। बहुतों के मकान ढह गए हैं। बहुत-से लोग खेती नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे ही और भी बहुत-से जरूरी काम बार-बार बाधित होते रहे हैं।

पिछले साल सितंबर के आखीर में हुई सर्जिकल स्ट्राइक से यह उम्मीद की गई थी कि इससे पाकिस्तान को सबक मिला होगा और सरहद पर होने वाली हिंसा, घुसपैठ और कश्मीर में आतंकी घटनाओं में कमी आएगी। लेकिन इस उम्मीद पर पानी फिर गया है। फिर, आठ नवंबर को नोटबंदी के सरकार के फैसले का एलान करते हुए प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि इससे आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। क्या ऐसा हो पाया? प्रधानमंत्री के दावे के उलट, आतंकी घटनाओं में और बढ़ोतरी ही दिखती है। नोटबंदी से कितना काला धन पकड़ में आया, इस बारे में तस्वीर भले साफ न हो, पर नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूटने की सरकार की शेखी की हवा निकल चुकी है।

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