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अवकाश के दिन

उत्तर प्रदेश में छुट्टियों की अपूर्व तादाद के चलते स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई के दिन 220 से घट कर 120 रह गए थे। इनमें ज्यादातर ऐसे अवकाश थे जो दूसरे राज्यों में नहीं होते।

Author May 1, 2017 5:42 AM
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ।

उत्तर प्रदेश के बाद अब दिल्ली सरकार ने भी छुट्टियों में कटौती का फैसला किया है, जो कि स्वागत-योग्य है। छुट्टियों की संख्या के मामले में शायद ही दुनिया का कोई और देश हमारी बराबरी कर सके। बहुत ज्यादा सार्वजनिक अवकाश होने से आए दिन सरकारी दफ्तरों और बैंकों से लेकर स्कूल-कॉलेज और नगर निगम के कार्यालय तक, सब कुछ बंद रहता है। इससे उन लोगों की तो मौज रहती है जिन्हें लोकतांत्रिक लहजे में लोक सेवक कहा जाता है, पर तकलीफ उठानी पड़ती है लोक को। लोगों के बहुत सारे आवश्यक काम मुल्तवी हो जाते हैं। सरकारी कामकाज और पढ़ाई-लिखाई तथा कारोबार पर भी बुरा असर पड़ता है। पर दिल्ली सरकार के पास कटौती की वैसी गुंजाइश नहीं है, जैसी योगी सरकार के पास थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों पंद्रह सार्वजनिक अवकाश कम कर दिए। पर यह गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में बयालीस सार्वजनिक अवकाश थे, जिनमें से सत्रह विभिन्न महापुरुषों की जयंतियां या पुण्यतिथियां थीं। उत्तर प्रदेश में छुट्टियों की अपूर्व तादाद के चलते स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई के दिन 220 से घट कर 120 रह गए थे। इनमें ज्यादातर ऐसे अवकाश थे जो दूसरे राज्यों में नहीं होते। उत्तर प्रदेश में यह चलन पिछले कुछ ही बरसों से था, क्योंकि इन छुट्टियों के पीछे उन तिथियों से जुड़ी विभिन्न समुदायों की भावनाओं को भुनाने की राजनीति काम कर रही थी।

किसी महापुरुष की जयंती या पुण्यतिथि को सार्वजनिक अवकाश का दिन घोषित करना सम्मान प्रकट करने का एकमात्र तरीका नहीं हो सकता। इसलिए योगी ने ठीक ही कहा कि उन तिथियों पर संबंधित महापुरुष के बारे में विद्यार्थियों को बताया जाएगा। दिल्ली सरकार ने इस मामले में योगी सरकार की सराहना करके बता दिया कि उसे प्रेरणा कहां से मिली। विभिन्न राज्य अलग-अलग काम में बढ़त लेते दिखते हैं। अगर सब एक दूसरे से खुले मन से सीखें तो विकास की रफ्तार बढ़ सकती है और उसका एक ज्यादा स्वीकार्य मॉडल विकसित हो सकता है। दिल्ली सरकार ने छुट्टी में कटौती का फैसला ऐसे समय किया जब दो दिन पहले ही नगर निगम चुनाव के नतीजे आए थे। इन चुनावों में दो सौ बहत्तर वार्डों में से आम आदमी पार्टी को सिर्फ अड़तालीस में जीत मिली। जबकि भाजपा को एक सौ इक्यासी में। जबकि दो साल पहले आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की सत्तर विधानसभा सीटों में से सड़सठ सीटें हासिल की थीं। क्या दिल्ली सरकार के ताजा फैसले के पीछे निगम चुनावों में लगा झटका भी कारण होगा?

जो हो, छुट्टियों में कटौती के पीछे समय के सदुपयोग का तर्क काम कर रहा है। फिर, कुछ और भी कदम क्यों न उठाए जाएं। मसलन, विरोध जताने के लिए बंद आयोजित करने और नाकाबंदी तथा रेल रोको जैसे कार्यक्रम न हों। इनसे बहुत सारे लोगों को तरह-तरह की परेशानी उठानी पड़ती है। बहुत जरूरी, यहां तक कि आपातकालीन सेवाएं भी बाधित हो जाती हैं। छात्र संगठन तो जरा-जरा सी बात पर विश्वविद्यालय बंद करा देते हैं और वकील तो हड़ताल के लिए हमेशा तैयार ही रहते हैं। हमारे देश में समस्याओं और शिकायतों का अंबार है। बेशक उन्हें जाहिर करने और अपनी मांग उठाने का लोकतांत्रिक हक सबको हासिल है। मगर जरूरी नहीं कि एक का विरोध दूसरे को भी जंचे। इसलिए आंदोलन के तरीके ऐसे हों जिनसे कम से कम व्यवधान पड़े।

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