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निज भाषा

भारत बहुभाषिक देश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग भाषाएं और बोलियां हैं। उनमें से किसी का भी महत्त्व हिंदी से कम नहीं है।
Author April 20, 2017 01:01 am
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।

आजादी के करीब सत्तर साल में भी अगर समूचे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली कोई एक भाषा नहीं बन सकी है तो इसकी वजह अब तक इसके प्रति सरकारों का ढीला-ढाला रवैया रहा है। खासकर राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद हिंदी की गति संतोषजनक नहीं है। इसके लिए मुख्य रूप से वे लोग जिम्मेदार रहे हैं, जिन्होंने सत्ता में रहते हुए इसके प्रसार के हर सवाल को भाषा-विवाद की कसौटी पर देखा या फिर व्यावहारिकता की दुहाई देकर अंगरेजी पर निर्भरता को बनाए रखा। दूसरी ओर, गैर-हिंदी प्रदेशों के नेताओं की ओर से भी इस भाषा को लेकर शायद ही कभी कोई ठोस पहलकदमी हुई। बल्कि इसके उलट ज्यादातर नेता और मंत्री हिंदी जानते हुए भी अमूमन हर मौके पर अंगरेजी का ही उपयोग करते हैं। अगर सार्वजनिक जगहों पर कहीं इसके प्रयोग की व्यावहारिक बाध्यता रही भी तो वहां हिंदी को दोयम या अंगरेजी के बाद वाली जगह ही मिली। ज्ञान और रोजगार के लिए अंगरेजी पर निर्भरता ने हिंदी को कितना नुकसान पहुंचाया है, यह किसी से छिपा नहीं है।

अब हिंदी के प्रयोग के मसले पर गठित एक संसदीय समिति की सिफारिशों को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है और अगर यह लागू होता है तो खुद राष्ट्रपति से लेकर मंत्रियों और सभी गणमान्य व्यक्तियों को अपनी बात हिंदी में रखनी पड़ सकती है। खासकर उन लोगों से अपने भाषण या बयान हिंदी में देने का अनुरोध किया जा सकता है, जो हिंदी पढ़ और बोल सकते हैं। हवाई जहाजों में कोई भी उद्घोषणा पहले हिंदी में होगी। संसदीय समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद आने वाले दिनों में सीबीएसइ और केंद्रीय विद्यालयों में दसवीं तक की पढ़ाई में हिंदी एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जाएगी। साथ ही कई अन्य स्तरों पर हिंदी के इस्तेमाल को जरूरी बनाने या फिर बढ़ावा देने की बातें इन सिफारिशों में शामिल हैं। गौरतलब है कि आधिकारिक भाषा पर संसद की यह समिति 1959 से अब तक राष्ट्रपति को नौ रिपोर्टें सौंप चुकी है। हालांकि हिंदी को ‘निज भाषा’ के स्तर पर देखने और इसको बढ़ावा देने को लेकर पहले भी कई बार पहलकदमी सामने आती रही है, मगर आज भी अगर हालत यह है कि अंगरेजी के बरक्स इसे दोयम या गौण महत्त्व की भाषा के तौर पर देखा जाता है तो इसके लिए हमारी सरकारों की जिम्मेदारी ज्यादा बनती है।

यह सही है कि भारत बहुभाषिक देश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग भाषाएं और बोलियां हैं। उनमें से किसी का भी महत्त्व हिंदी से कम नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई एक ऐसी भाषा नहीं है, जिसे सभी राज्यों या इलाकों को जोड़ने वाली कहा जा सके। हालांकि अतीत में भाषा के सवाल पर जिस तरह के विवाद हो चुके हैं, उसमें हिंदी को बढ़ावा देते हुए यह भी ध्यान रखना होगा कि इसकी वजह से दूसरी भाषाओं पर कोई नकारात्मक असर न पड़े। यों उत्तर भारत के लगभग सभी हिस्सों में साधारण लोगों की बोलचाल, पढ़ाई-लिखाई से लेकर संस्थागत स्तर तक हिंदी को जगह मिली हुई है। लेकिन इसके अलावा भी देश के ज्यादातर इलाकों में हिंदी ने जैसी जगह बनाई है, उसमें इसके विकास और प्रसार की बड़ी संभावनाएं हैं। पर यह तभी संभव हो पाएगा जब सरकार के स्तर पर इसके प्रयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, कुछ मामलों में अनिवार्य बनाया जाएगा।

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