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अभिव्यक्ति के जोखिम

गुरमेहर का यह संदेश शायद विवाद की वजह नहीं बनता, अगर इस मसले पर मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग ने दखल नहीं दिया होता।

Author March 1, 2017 2:49 AM
दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा गुरमेहर कौर ने एबीवीपी के खिलाफ कैम्पेन चलाया था। ( Photo Source: Facebook)

यह सही है कि सोशल मीडिया आज अभिव्यक्ति का एक ताकतवर मंच बन चुका है। लेकिन यह भी सच कि अक्सर इस पर चलने वाले सवाल-जवाब का सिरा कहीं नहीं पहुंचता और विवाद कई बार अप्रिय मोड़ भी ले लेता है। यह शायद ही किसी ने सोचा होगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर का एक संदेश इस कदर राष्ट्रीय बहस का मसला बन जाएगा। पिछले दिनों रामजस कॉलेज में एक सेमिनार के मसले पर हुए विवाद और हिंसा में एबीवीपी यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भूमिका के सवाल पर गुरमेहर ने सोशल मीडिया पर अपनी एक राय जाहिर की कि ‘मैं एबीवीपी से नहीं डरती!’ इस बयान को उस खास घटना के संदर्भ में एक राय की तरह देखा जा सकता था। मगर सोशल मीडिया में इस मुद्दे पर एक तीखी बहस खड़ी हो गई। गुरमेहर का यह संदेश शायद विवाद की वजह नहीं बनता, अगर इस मसले पर मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी वीरेंद्र सहवाग ने दखल नहीं दिया होता। सहवाग ने ताजा प्रसंग पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन गुरमेहर के एक पुराने वीडियो में प्लेकार्ड पर लिखे संदेश के साथ टिप्पणी कर दी, जिसकी वजह से मामले ने तूल पकड़ लिया।

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दरअसल, पिछले साल अप्रैल में गुरमेहर ने एक मूक वीडियो में प्लेकार्ड के जरिए सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देते हुए यह कहा था कि ‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा!’ पहले वीरेंद्र सहवाग ने एक तरह से इस बयान का मजाक बना दिया, फिर अभिनेता रणदीप हुड्डा, कुश्ती की खिलाड़ी बबीता फोगाट के अलावा सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वालों ने गुरमेहर पर पाकिस्तान के प्रति नरम होने तक का आरोप लगा दिया। मुक्केबाज योगेश्वर दत्त ने गुरमेहर की तुलना उसामा बिन लादेन और हिटलर से कर दी। गृह राज्यमंत्री किरन रिजीजू ने उनके ‘दिमाग को गंदा करने’ की बात कही तो कई दूसरे नेता भी गुरमेहर के पक्ष-विपक्ष में उतर गए। सोशल मीडिया पर लगातार अपमानजनक टिप्पणियों और धमकियों का आलम यहां तक पहुंच गया कि एक युवक ने गुरमेहर को वीभत्स तरीके से बलात्कार की धमकी भी दे डाली।

दुनिया भर में इंसानी समाज के लिए काम करने वाली तमाम मशहूर हस्तियों, लोगों, मानवाधिकार संगठनों ने युद्ध को मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन माना है। हो सकता है कि युद्ध में विरोधी पक्ष के रूप में दो देश होते हों, लेकिन युद्ध का हासिल आखिरकार असंख्य इंसानों की मौत और इंसानियत के नुकसान की शक्ल में ही सामने आता है। इस लिहाज से अगर महज बीस साल की छात्रा गुरमेहर अपने पिता के शहीद होने के बावजूद किसी खास पक्ष को कसूरवार ठहराने के बजाय उसके कारणों को जिम्मेदार ठहरा रही थी तो इसे उस उदात्त भावना का सबूत माना जाना चाहिए, जिसके जरिए ही सौहार्द की बुनियाद पर एक इंसानी समाज का सपना साकार होता है। अतीत के नफरत के अध्याय को भुला कर ही इंसानियत और प्रेम का समाज बनाया जा सकता है। इस लिहाज से देखें तो गुरमेहर की बातें हिंसा और घृणा के बरक्स न्याय और सद्भाव की वकालत करती हुई दिखती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक भारत में विचारों के स्तर पर मतभेद रखने के चलते किसी को परेशान कर देने का यह विरल उदाहरण है। जिस लड़की के पिता करगिल युद्ध न सही, आतंकवादियों से लड़ते हुए देश के लिए शहीद हो गए, उसकी सद्भाव की मांग को कठघरे में खड़ा कर दिया गया। यह सोशल मीडिया का एक ऐसा विकृत स्वरूप है, जहां बातों का संदर्भ इस कदर बिगाड़ दिया जा सकता है कि कोई निर्दोष व्यक्ति खुद को पीड़ित महसूस करने लगे।

 

 

वीरेन्द्र सहवाग ने गुरमेहर कौर से जुड़े सवालों को किया नजरअंदाज

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