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संपादकीय: स्वर्णिम उपलब्धि

इस बार नीरज चोपड़ा ने मई में डायमंड लीग शृंखला में 87.43 मीटर के अपने ही प्रदर्शन में सुधार किया और एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए 88.06 मीटर का नया राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया।

Author August 29, 2018 3:08 AM
नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक में गोल्ड मेडल जीता। (फोटो-रायटर्स)

जकार्ता में चल रहे एशियाई खेलों में नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल कर पदक तालिका में भारत को एक और सम्मान दिलाया। यह एक बड़ी उपलब्धि इस लिहाज से है कि एशियाई खेलों के इतिहास में पहली बार पुरुषों की भाला फेंक प्रतियोगिता में भारत को सोने का तमगा मिला। इस बार नीरज चोपड़ा ने मई में डायमंड लीग शृंखला में 87.43 मीटर के अपने ही प्रदर्शन में सुधार किया और एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए 88.06 मीटर का नया राष्ट्रीय कीर्तिमान बनाया। हालांकि वे 2014 के 89.75 मीटर के रेकॉर्ड को नहीं तोड़ पाए, लेकिन उनकी ताजा जीत और स्वर्ण पदक की खूबसूरती यह है कि इस प्रतियोगिता में दूसरे विजेता यानी रजत और कांस्य पदक हासिल करने वाले खिलाड़ी नीरज से काफी पीछे रहे। यानी कहा जा सकता है कि इस बार नीरज की होड़ खुद से थी और मैदान में उन्होंने अपनी क्षमता को साबित भी किया। इससे पहले 1982 में नई दिल्ली में हुए एशियाई खेलों में गुरतेज सिंह ने कांस्य पदक जीता था। इस तरह नीरज एशियाई खेलों की भाला फेंक स्पर्धा में पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय बने।

जाहिर है, इतने लंबे समय के बाद इस खेल में भारत की शानदार कामयाबी सबके लिए खुश होने की बात है। लेकिन इसके साथ यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि इतनी बड़ी आबादी वाला हमारा देश भाला फेंक जैसे खेल में कोई पदक हासिल करने से बीते छत्तीस साल तक वंचित क्यों रहा! इसका कारण भारत में खेल नीति का वह पक्ष है, जहां प्रतिभाओं की खोज और उनके प्रशिक्षण के पहलू पर बहुत ज्यादा काम नहीं किया जाता। इसके अलावा, जिन खेलों में भारत अपनी अच्छी-खासी मौजूदगी दर्ज कर सकता है, उनमें भी कई बार बेहद कमजोर उपस्थिति दिखती है। जबकि ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिनमें दूरदराज या ग्रामीण इलाकों में मौजूद प्रतिभाएं अगर किन्हीं वजहों से सामने आ सकीं तो उन्हें बड़ी कामयाबी हासिल करने के लिए बहुत ज्यादा प्रशिक्षण की जरूरत नहीं पड़ी। दिक्कत यह है कि क्रिकेट जैसे खेल को जिस तरह बढ़ावा दिया गया, उससे देश भर में इस खेल को काफी लोकप्रियता मिली। यह अच्छी बात है। लेकिन अफसोस की बात है कि इस वजह से बाकी खेलों को अपेक्षित महत्त्व नहीं मिल सका।

इसके अलावा, इस बार मैदान में भारत के कई अन्य खिलाड़ियों ने अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज की और देश के लिए पदक हासिल किए। मसलन, खेलों के शुरुआती दौर में ही बजरंग पूनिया ने पुरुष कुश्ती में, फिर विनेश फोगाट ने महिला कुश्ती में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। तीरंदाजी सहित कुछ अन्य खेलों में भी भारत के खिलाड़ियों ने बेहतरीन और विजयी प्रदर्शन किए। फिलहाल आठ स्वर्ण, सोलह रजत और इक्कीस कांस्य पदकों के साथ भारत सूची में नौवें स्थान पर है। लेकिन चूंकि अभी खेलों को खत्म होने में तीन दिन बाकी हैं, इसलिए और पदकों की उम्मीद की जानी चाहिए। लेकिन इस बार अफसोस की बात यह रही कि आमतौर पर सभी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में कबड्डी में सब पर हावी रहने वाली भारत की पुरुष और महिला टीमों को इस बार स्वर्ण से वंचित रहना पड़ा। जबकि खासतौर पर कबड्डी में भारत को दुनिया भर में बादशाहत हासिल थी। हालांकि पदक जीत या हार का पैमाना माने जाते हैं, इसलिए इनका अपना महत्त्व है। उम्मीद है कि इस बार के नतीजे से भारतीय खिलाड़ी भविष्य में और बेहतर प्रदर्शन के लिए खुद को तैयार करेंगे।

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