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पारदर्शिता का चुनाव

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से जुड़ा विवाद इसका उदाहरण है कि सरकार के लापरवाह रवैये के चलते किसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता कैसे कठघरे में खड़ी हो सकती है!
Author April 18, 2017 00:22 am
(फाइल फोटो)

मतदान के लिए इवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से जुड़ा विवाद इसका उदाहरण है कि सरकार के लापरवाह रवैये के चलते किसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता कैसे कठघरे में खड़ी हो सकती है! हालांकि चुनाव आयोग इवीएम को पूरी तरह सुरक्षित बताता रहा है, लेकिन अब जब कई राजनीतिक दलों की ओर से इस मसले पर उठाए गए सवाल का दबाव बढ़ने लगा है और सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपीएटी की प्रणाली अमल में लाने की समय-सीमा बताने का निर्देश दिया है, तब आयोग ने एक बार फिर ‘मौजूदा माहौल’ का हवाला देते हुए सरकार से इसके लिए तत्काल धन जारी करने का आग्रह किया है। गौरतलब है कि पिछले महीने पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों की घोषणा के बाद मायावती, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल ने इवीएम में गड़बड़ी की आशंका जताई। उसके बाद सोलह राजनीतिक दलों ने स्वच्छ चुनाव के लिए इवीएम को बाधा बताया और पारदर्शिता लाने के लिए मतपत्र वाली व्यवस्था फिर से शुरू करने की मांग की।

लेकिन इस पूरे प्रकरण में भाजपा ने इवीएम को पूरी तरह भरोसेमंद बताया। जबकि 2009 के आम चुनावों के बाद लालकृष्ण आडवाणी, सुब्रमण्यम स्वामी जैसे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इवीएम पर संदेह जताया था। तब भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने इवीएम से लोकतंत्र को खतरे पर केंद्रित एक किताब भी लिखी। दुनिया के कई विकसित देशों में इवीएम को निरापद नहीं माना गया और कुछ देशों में प्रयोग के बाद इसकी खामियों के मद््देनजर इस पर पाबंदी लगा दी गई। भारत में जब मामला अदालत में गया तो अक्तूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ-सुथरे चुनाव के लिए वीवीपीएटी से लैस इवीएम से मतदान कराने की व्यवस्था करने का निर्देश दिया था। यानी अदालत ने एक तरह से इवीएम को संदेह से परे नहीं बताया और उस पर भरोसे को बहाल रखने के लिए जरूरी तकनीकी इंतजाम के निर्देश दिए। उसके बाद की जिम्मेदारी सरकार की थी। मगर यह हैरान करने वाली बात है कि पिछले तीन साल के दौरान चुनाव आयोग सरकार को कम से कम ग्यारह बार याद दिला चुका है कि वह इवीएम में वीवीपीएटी यानी पेपर ट्रेल की व्यवस्था के लिए धन जारी करे।

अगर इतनी बार अनुरोध किए जाने के बावजूद सरकार ने 3,174 करोड़ रुपए की राशि जारी करना जरूरी नहीं समझा तो इसकी क्या वजह हो सकती है! निर्वाचन आयोग की ओर से सरकार को यह सूचित भी किया जा चुका था कि वीवीपीएटी के लिए अगर फरवरी, 2017 तक आॅर्डर नहीं दिया गया तो सितंबर, 2018 तक इन मशीनों को अगले चुनावों के लिए तैयार करना मुश्किल होगा। फिर आवश्यक धन जारी किए जाने के बाद भी वीवीपीएटी के साथ मतदान संभव बनाने में काफी वक्त लग सकता है। इसलिए यह आशंका स्वाभाविक है कि अगर राशि जारी करने में मौजूदा टालमटोल जारी रही तो अगले आम चुनाव में भी वीवीपीएटी का इस्तेमाल मुश्किल होगा। लोकतंत्र पर जनता का भरोसा कायम रहे, इसके लिए जरूरी है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनावों और उनकी प्रक्रिया में किसी तरह के शक की गुंजाइश न रहे।

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