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अर्थव्यवस्था की तस्वीर

अर्थव्यवस्था की एक विरोधाभासी तस्वीर पेश की है। एक तरफ खुदरा महंगाई में राहत बरकरार है, बल्कि खुदरा महंगाई और नीचे आई है, वहीं दूसरी तरफ औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) में गिरावट दर्ज हुई है।

Author June 14, 2017 5:31 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

मंगलवार को आए आंकड़ों ने अर्थव्यवस्था की एक विरोधाभासी तस्वीर पेश की है। एक तरफ खुदरा महंगाई में राहत बरकरार है, बल्कि खुदरा महंगाई और नीचे आई है, वहीं दूसरी तरफ औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) में गिरावट दर्ज हुई है। खुदरा महंगाई का यह 2012 के बाद का सबसे निचला स्तर है। खुदरा महंगाई मई में 2.8 फीसद और अप्रैल में 2.99 फीसद रही। जबकि पिछले साल मई में खुदरा महंगाई 5.76 फीसद थी। ताजा आंकड़ा रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित चार फीसद के मध्यावधि लक्ष्य से काफी कम है। महंगाई के मोर्चे पर दिख रही राहत के चलते रिजर्व बैंक से नीतिगत दरों में कटौती की मांग तेज हो सकती है। पिछले दिनों जारी हुई द्विमासिक मौद्रिक समीक्षा में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को यथावत रखा, जो उद्योग जगत को भी नागवार गुजरा और वित्त मंत्रालय को भी। पर खुदरा महंगाई में नरमी बने रहने का रुख जारी ही रहेगा, यह दावा नहीं किया जा सकता, क्योंकि जीएसटी के संभावित असर को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर घट कर अप्रैल में 3.1 फीसद पर आ गई। जबकि मार्च में यह 3.75 फीसद रही थी। मार्च का यह संशोधित आंकड़ा है; पहले मार्च में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 2.6 फीसद बताई गई थी। गिरावट का अंदाजा लगाने के लिए पिछले साल के आंकड़े देखना जरूरी है। पिछले साल अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर साढ़े छह फीसद थी। गिरावट के पीछे खासकर मैन्युफैक्चरिंग, खनन व बिजली क्षेत्र का लचर प्रदर्शन है। मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर इस साल अप्रैल में 2.6 फीसद रही, जो कि अप्रैल 2016 में 5.5 फीसद रही थी। इसी तरह खनन का आंकड़ा अप्रैल में 4.2 फीसद रहा, जो एक साल पहले की समान अवधि में 6.7 फीसद था। सबसे ज्यादा गिरावट बिजली उत्पादन में दर्ज की गई। इस साल अप्रैल में इसकी वृद्धि दर 5.4 फीसद पर आ गई, जो कि पिछले साल अप्रैल में 14.4 फीसद थी। आइआइपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा तीन चौथाई से भी कुछ अधिक है। लिहाजा, मैन्युफैक्चरिंग का प्रदर्शनकमजोर रहने की सूरत में आइआइपी के गति पकड़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती। पर आइआइपी को संभाले रहने के लिहाज से ही नहीं, रोजगार की दृष्टि से भी मैन्युफैक्चरिंग का प्रदर्शन काफी मायने रखता है, क्योंकि खेती के बाद यह रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है।

इस समय रोजगार के मोर्चे पर निराशाजनक तस्वीर है, तो इसका एक प्रमुख कारण मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर में आई गिरावट है। खनन और बिजली के कमजोर प्रदर्शन औद्योगिक क्षेत्र में घटती मांग और ठहराव को दर्शाते हैं। जाहिर है कि न तो बुनियादी उद्योगों में स्थिति संतोषजनक है न मैन्युफैक्चरिंग में। आइआइपी की खस्ता हालत औद्योगिक क्षेत्र के लिए ऋणवृिद्ध में आई गिरावट और नए निवेश में ठहराव से भी प्रतिबिंबित होती है। यह हालत तब है जब सरकार ने स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया जैसे अनेक कार्यक्रम चला रखे हैं। इन कार्यक्रमों से मैन्युफैक्चरिंग की गति बढ़नी चाहिए थी, पर इसके विपरीत सुस्ती नजर आ रही है। रोजगार के मोर्चे पर और बुरा हाल है। अनुमान है कि देश के तीस फीसद से ज्यादा युवा बेरोजगार हैं। नौकरियों में छंटनी का क्रम भी शुरू हो गया है। क्या यह रोजगार-विहीन विकास की बानगी है!

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