JANSATTA EDITORIAL ABOUT E RIKSHAW DRIVER MURDER IN DELHI - Jansatta
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टोकने का फर्ज

दिल्ली में खुलेआम दो लड़कों को पेशाब करने से रोकने पर सोमवार को एक ई-रिक्शा चालक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई।

Author May 31, 2017 5:05 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दिल्ली में खुलेआम दो लड़कों को पेशाब करने से रोकने पर सोमवार को एक ई-रिक्शा चालक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। कुछ दिनों पहले आनंद विहार इलाके में कवि देवीप्रसाद मिश्र को सड़क पर खुलेआम पेशाब कर रहे डीटीसी बस के चालक और परिचालक ने टोकने पर बुरी तरह मारा-पीटा था। एक तरफ भारत सरकार देश भर में जोर-शोर से स्वच्छता अभियान चला रही है, और दूसरी तरफ गंदगी की आदतें इतने गहरे पैठी हुई हैं कि रोकने या टोकने की कई बार बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है। स्वच्छता का मतलब अस्वच्छता न करने से भी है। ऐसे में अगर दिल्ली के जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन के पास कार से उतर कर खुले में पेशाब कर रहे दो युवकों को ई-रिक्शा चालक रवींद्र कुमार ने टोका तो वह अपनी नागरिकीय जिम्मेदारी को ही पूरा कर रहा था। उस समय तो वे दोनों युवक वहां से चले गए और रात करीब आठ बजे अपने बीस-पच्चीस साथियों को लेकर आए। उन लोगों ने रवींद्र कुमार को इतना पीटा कि अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसकी मौत हो गई।

इस घटना से स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतने मर्माहत हुए कि विदेश दौरे पर होने के बावजूद उन्होंने इसकी तीखी निंदा की और अधिकारियों को दोषियों का पता लगाने और उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय आपदा कोष से मृतक के परिजनों को एक लाख रुपए देने के लिए भी कहा। इससे ज्यादा दरियादिली तो दिल्ली सरकार ने दिखाई, जिसने पांच लाख रुपए का मुआवजा देने की घोषणा की है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने घटनास्थल का दौरा भी किया और मृतक की पत्नी को अस्थायी नौकरी का आश्वासन दिया। सवाल यह भी है कि हमारे समाज में सफाई को लेकर सजगता की इतनी कमी क्यों है? इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती हैं लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि हम जिन ग्रामीण इलाकों को पिछड़ा हुआ मान कर चलते हैं, वहां उतनी गंदगी नहीं मिलेगी, जितनी कि शहरों में दिखाई पड़ती है। कई शहरों में रेलवे स्टेशन, बस अड््डे, अस्पताल और बाजार जैसे सार्वजनिक स्थल तो ऐसे दिखते हैं मानो गंदगी की सबसे बड़ी पनाहगाह हों।

ऐसे लोगों की संख्या भी काफी है जो कहीं भी पेशाब करने और थूकने को गलत या अनुचित नहीं मानते, उनके व्यवहार से तो ऐसा ही लगता है। कुछ नगर निगमों और नगर पालिकाओं की भी हालत ठीक नहीं है। तमाम जगहों पर निर्धारित संख्या में सार्वजनिक मूत्रालय और शौचालय नहीं होते। जहां होते हैं, वहां सफाई का नियमित इंतजाम नहीं होता। बस अड्डों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों पर कई बार ठेकेदार मनमाना शुल्क भी वसूलते हैं। महिलाओं से तो बीस-पच्चीस रुपए वसूलना मानो ठेकेदारों का कानूनी अधिकार हो! कई बार लोग शुल्क बचाने के लिए सार्वजनिक जन सुविधाएं होने के बावजूद इधर-उधर की जगह तलाशते हैं। कुल मिलाकर स्वच्छता का मसला आज भी एक जटिल सवाल है। मगर समाज में कुछ हिम्मती और जागरूक लोग हैं, जो टोक रहे हैं। इस टोकने को सही नजरिए से देखा जाना चाहिए, पर रवींद्र कुमार को टोकने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। क्या हमारे समाज में केवल गुस्सा बढ़ रहा है और बाकी सब तरह की भावनाएं सुप्त होती जा रही हैं?

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