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बर्बरता के हाथ

क्या विडंबना है कि उन्हें उन लोगों ने मारा, जो मस्जिद में शब-ए-कद्र की नमाज अता करने आए थे, जिसे इबादत के लिए पवित्र रात्रि माना जाता है।

Author June 26, 2017 5:16 AM
डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को भीड़ ने मस्जिद के बाहर पीट-पीट कर मार डाला। (फाइल फोटो)

कश्मीर में हिंसा और मारकाट कोई आकस्मिक या अनहोनी चीज नहीं रह गई है। फिर भी, शुक्रवार को श्रीनगर के मुख्य इलाके में स्थित जामा मस्जिद के बाहर ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित की जिस-तरह निर्वस्त्र करके पीट-पीट कर हत्या की गई, वह सर्वथा दिल दहला देने वाली घटना है। क्या विडंबना है कि उन्हें उन लोगों ने मारा, जो मस्जिद में शब-ए-कद्र की नमाज अता करने आए थे, जिसे इबादत के लिए पवित्र रात्रि माना जाता है। अयूब की ड्यूटी मौके पर नमाजियों की सुरक्षा पर नजर रखने के लिए की गई थी। वे यह सुनिश्चित करने में लगे थे कि कोई व्यक्ति मस्जिद में हथियार वगैरह न ले जाने पाए। इसलिए वे आने-जाने वालों की कथित रूप से तस्वीरें खींच रहे थे। आदेशानुसार अयूब सादी वर्दी में थे। कुछ लोगों ने उनसे तस्वीरें खींचने की वजह जाननी चाही और फिर उन पर हमलावर हो गए। आत्मरक्षा में उन्हें गोली चलानी पड़ी, जिसके बाद उन्मादी भीड़ बेकाबू हो गई। पहले उन लोगों ने अयूब को नंगा किया और फिर पत्थरों और डंडों से पीट-पीट कर मौके पर ही मार डाला।

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इस मामले में फिलहाल दो हमलावरों की गिरफ्तारी हुई है। हालांकि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपनी कड़ी प्रतिक्रिया में हमलावरों को चेताया है कि अगर पुलिस के सब्र का बांध टूट गया तो चीजें मुश्किल हो जाएंगी। मगर यह सिर्फ बयान देने का नहीं, बल्कि आगे बढ़ कर कुछ करने का वक्त है। कहने की जरूरत नहीं कि आतंकवाद से ग्रसित इस राज्य में पुलिसकर्मियों के लिए स्थिति लगातार विषम होती जा रही है। पुलिस अफसरों समेत सोलह सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी हमलों में मारे जा चुके हैं, जो किसी भी अन्य भारतीय राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा तादाद है। पिछले हफ्ते आतंकवादियों ने एक वाहन में ड्यूटी से लौट रहे छह पुलिसकर्मियों की अनंतनाग जिले में हत्या कर दी थी। मगर उनके अंतिम संस्कार में किसी नेता ने जाने की जहमत नहीं उठाईी। किसी आतंकी या आतंकी समूह द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमला करने और भीड़ द्वारा किसी पुलिस अधिकारी को पीट-पीट कर मार डालने में अंतर है। राज्य में सत्ताधारी भाजपा-पीडीपी गठबंधन को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा। आखिर सरकार गठन के समय विश्वास बहाली को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई थी, लेकिन देखने में आ रहा है कि कश्मीर में स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

पुलिस पर हमले बढ़ने की एक वजह आतंकी संगठन हिज्बुल-मुजाहिद्दीन के कमांडर बुरहानी वानी की मौत बताई जा रही है, जिसे सुरक्षा बलों ने जुलाई, 2016 में एक कार्रवाई के दौरान मार गिराया था। वानी ने अपने एक वीडियो संदेश में पुलिसकर्मियों की हत्या करने को जायज ठहराया था। उसने कहा था कि भले ही पुलिसकर्मी हमारे अपने लोग हैं, लेकिन वे कश्मीरियों के दुश्मन हैं। आतंकी समूहों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग दूसरे कश्मीरियों के मन में भी पुलिसकर्मियों के प्रति नफरत भरना चाहते हैं। हालांकि आतंकियों के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में कश्मीरी युवक पुलिस में भर्ती होने के लिए आगे आए हैं। आतंकी पुलिसकर्मियों पर हमले करके लोगों को डराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि कश्मीर में घटनाएं जिस तरह का मोड़ ले रही हैं वह हर हाल में बहुत दुखद है।

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