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अमेरिका का रास्ता

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सात मुसलिम देशों के नागरिकों के प्रवेश पर पाबंदी के बाद अब एच 1-बी वीजा नीति को सख्त बनाने की ओर कदम बढ़ाया है।

Donald Trump vs Media, The New York Times news, Donald Trump new york Times, Donald Trump Mediaअमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (फाइल फोटो)

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सात मुसलिम देशों के नागरिकों के प्रवेश पर पाबंदी के बाद अब एच 1-बी वीजा नीति को सख्त बनाने की ओर कदम बढ़ाया है। अमेरिकी हितों की सुरक्षा के नाम पर इस मसले पर संसद में एक विधेयक भी रखा गया है, जो पास हो जाता है तो उसका सबसे बड़ा खमियाजा भारतीय आइटी पेशवरों को उठाना पड़ेगा। इसमें एच 1-बी वीजा हासिल करने के लिए न्यूनतम वेतन सीमा साठ हजार से बढ़ा कर एक लाख तीस हजार अमेरिकी डॉलर करने का प्रस्ताव है। गौरतलब है कि एच 1-बी वीजा बाहरी विशेषज्ञों को अमेरिका आकर अपनी विशेषज्ञता का लाभ देने के मकसद से जारी किया जाता है। अमेरिकी नागरिकों के मुकाबले बहुत कम मेहनताना देने की सुविधा के चलते ही भारतीय पेशेवरों को आसानी से रोजगार मिल जाता था। इसलिए पहली नजर में यह कदम ऐसे लोगों के हित में उठाया गया लगता है। लेकिन सच यह है कि यह कानून बनने के बाद वहां कंपनियों के लिए भारत या दूसरे देशों से आने वाले आइटी पेशेवरों को नौकरी पर रखना मुश्किल हो जाएगा।

हालांकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाने वाले इस व्यवसाय के मद्देनजर शायद इस विधेयक का पास होना मुश्किल होगा। फिर भी इसका तत्काल असर यह सामने आया कि भारत की पांच दिग्गज आइटी कंपनियों को शेयर बाजार में तैंतीस हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने की खबर आई। राष्ट्रपति चुने जाने के पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने प्रचार अभियान के दौरान जिस तरह के वादे किए, वे दुनिया भर में चिंता की वजह बने थे। थोड़ी उम्मीद इसलिए बची हुई थी कि अमेरिका जैसे देश की कमान संभालने के बाद ट्रंप के लिए शायद अपने उन वादों को उसी रूप में लागू करना आसान नहीं होगा। लेकिन राष्ट्रपति पद का कार्यभार औपचारिक रूप से संभालने के बाद अपने शुरुआती दौर में ही वे जिस तरह के फैसलों पर अमल के लिए बाकायदा तकनीकी पहल भी कर रहे हैं, वह न केवल दुनिया के स्तर पर, बल्कि खुद अमेरिका में गहरी चिंता की लहर पैदा कर रहा है।

हालत यह है कि इन नीतियों की ओर बढ़ते उनके कदम के विरोध में अमेरिका के भीतर ही विरोध तेजी से बढ़ता जा रहा है। यही नहीं, खबरें यह भी आ चुकी हैं कि दुनिया भर में अमेरिका के बहुत सारे राजनयिकों ने राष्ट्रपति ट्रंप के आप्रवासियों पर पाबंदी लगाने के फैसले की आलोचना की है। इससे पहले अमेरिका की कार्यकारी अटॉर्नी जनरल सैली येट्स ने भी प्रवासियों के मसले पर ट्रंप के आदेश का बचाव न करने की अपील की थी। इसके बदले ट्रंप ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। जाहिर है, ट्रंप जिस रास्ते पर चल पड़े हैं, खुद अमेरिका के भीतर ही उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सवाल है कि अगर उनकी कट्टर नीतियों में ही अमेरिका का हित निहित है तो इतने बड़े पैमाने पर खुद अमेरिकी नौकरशाही और तंत्र के दूसरे हिस्सों से लेकर साधारण जनता तक को उनके विरोध में क्यों उतरना पड़ रहा है? इस विरोध में खास बात यह है कि बाहरी देशों के लोगों के प्रति ट्रंप की नीतियों का विरोध करने वाले अमेरिकी हैं। इसलिए देखना है कि आने वाले दिनों में ट्रंप की नीतियों का विश्व राजनीति और खुद अमेरिका पर कैसा असर पड़ता है।

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