संपादकीय: पसरता अवसाद

सामान्य दिखते व्यक्ति के भीतर चुपचाप कोई मानसिक परेशानी पल रही होती है और उसे पता भी नहीं चलता।

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ऊपर से सहज और सामान्य दिखते व्यक्ति के भीतर चुपचाप कोई मानसिक परेशानी पल रही होती है और उसे पता भी नहीं चलता। मगर जब ऐसे लोगों की संख्या आम होने लगती है जिनके व्यवहार की कुछ बातें उनकी मनोग्रंथियों का संकेत देती लगती हैं तब लोगों का ध्यान इस ओर जाता है। इस मसले पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सहयोग से बंगलुरु स्थित निमहांस यानी नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंस ने पहली बार देश के बारह राज्यों में एक व्यापक अध्ययन किया। इसमें ये तथ्य भी सामने आए कि महज तेरह साल से ऊपर के बच्चे भी एक या कई तरह की मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक देश में वयस्कों की कुल आबादी का तेरह फीसद तनाव, अवसाद या किसी न किसी तरह की मानसिक परेशानी की चपेट में है।

इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि दस फीसद लोग जहां अवसाद और घबराहट जैसी आम बीमारी की जद में हैं, वहीं दो फीसद आबादी इससे ज्यादा जटिल स्थिति में स्कित्जोफ्रेनिया या दोहरी मन:स्थिति का सामना कर रही है। सवाल है कि चुपचाप यह कैसा तनाव पसर रहा है जिसने इतनी बड़ी तादाद में लोगों के बीच पैठ बना ली है! क्यों व्यक्ति अपने मन में चल रही उथल-पुथल को किसी से साझा नहीं कर पाता और आखिरकार मानसिक संतुलन खो बैठता है। सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति का एक ऐसा मंच माना जाता है जो सबके लिए सुलभ है। लेकिन यह शिकायत आम है कि वहां असहमति को सहजता से नहीं लिया जाता, इसलिए कोई संवेदनशील व्यक्ति वहां भी तनाव का शिकार हो जा सकता है।

परामर्श केंद्र या काउंसिलिंग सेंटर पहुंचने वाले लोग अगर तनाव के शुरुआती दौर में होते हैं तो सही दिशा में हुई काउंसिलिंग उन्हें अवसाद में जाने से रोक लेती है। अगर इन स्थितियों को सामाजिक जीवन-शैली में रचे-बसे व्यक्ति के भीतर घुले संकोच के कारण नजरअंदाज किया जाता है तो वही मानसिक असंतुलन आगे चल कर स्कित्जोफ्रेनिया में तब्दील हो जा सकता है। इस चरण में पहुंचने के बाद व्यक्ति का इलाज थोड़ा जटिल हो जाता है। लेकिन आखिर कोई व्यक्ति इस हालत में पहुंचता कैसे है? रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम बातों और घटनाओं से दो-चार होने वाले किसी भी व्यक्ति के भीतर कई तरह के भाव पैदा होते हैं और जमा होते रहते हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि सामाजिक आचार-व्यवहार में घुला संकोच कई बार भावनाओं के उतार-चढ़ाव से उपजी स्थितियों को किसी से साझा करने से रोकता है।

जबकि बिना किसी को नुकसान पहुंचाए अपनी भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति व्यक्ति को मानसिक रूप से स्वस्थ और संवेदनशील बनाए रखती है। इसके उलट अगर भावनाओं को दबाया जाता है या किसी भी रूप में उसकी अभिव्यक्ति संभव नहीं हो पाती, तो वही पहले तनाव और फिर अवसाद में तब्दील हो जाता है। शरीर की किसी चोट या रोग के इलाज के लिए लोग बिना हिचक डॉक्टर के पास जाते हैं। लेकिन जरूरत होने पर भी बहुत कम लोग मनोवैज्ञानिकों या मनोचिकित्सकों का सहारा लेते हैं, जिससे यही जाहिर होता है कि समाज में स्वास्थ्य के प्रति एकांगी नजरिया हावी है। इसलिए पहली जरूरत यह है कि स्वास्थ्य को समग्र रूप में यानी मानसिक संतुलन से भी जोड़ कर देखने का रुझान समाजव्यापी बने

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