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बेजा भार

नोटबंदी के एलान के बाद लोगों को होती रही परेशानियों के बीच दिलासा देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि पचास दिन का वक्त दें, फिर जैसा भारत आप चाहते हैं वैसा ही दिखेगा।
Author August 9, 2017 05:17 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फाइल फोटो)

नोटबंदी के एलान के बाद लोगों को होती रही परेशानियों के बीच दिलासा देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि पचास दिन का वक्त दें, फिर जैसा भारत आप चाहते हैं वैसा ही दिखेगा। पचास दिन कब के बीत गए। कई-कई दिन तक घंटों कतार में लग कर लोगों ने जो उम्मीदें पाली थीं, वैसा कुछ होना तो दूर, उलटे कई मामलों में मुश्किलें पहले से बढ़ गई हैं। सेवाओं पर अठारह फीसद जीएसटी लग जाने से तमाम सेवाएं पहले से महंगी हो गई हैं। मध्यवर्ग के उपभोग-व्यय का बड़ा हिस्सा तो सेवाओं का ही रहता है। वित्तीय लेन-देन पर लगने वाले शुल्क भी लोगों की जेब हल्की कर रहे हैं। एटीएम की सुविधा इस मकसद से शुरू की गई थी कि इससे बैंकों में भीड़ छंटेगी और बैंकों को राहत मिलने के साथ-साथ लोगों को भी सहूलियत होगी। लेकिन अब लगता है कि इसमें सुविधा का सवाल कम और राजस्व कमाने का पहलू प्रमुख होता जा रहा है। गौरतलब है कि एटीएम इस्तेमाल के मुफ्त अवसर समाप्त होने के बाद लगने वाले शुल्क से देश के सबसे बड़े बैंक यानी भारतीय स्टेट बैंक ने जहां 2015-16 में 310.44 करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया था, वहीं उसने 2016-17 में 1484.10 करोड़ रुपए की कमाई की। यानी एटीएम शुल्क से होने वाली उसकी कमाई में 378 फीसद का भारी उछाल आया। यह जानकारी एक आइआरटी आवेदन के जवाब के तौर पर सामने आई है।

विडंबना यह है कि नोटबंदी के एलान के बाद रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को सलाह दी थी कि दस नवंबर से तीस दिसंबर तक एटीएम शुल्क माफ कर दें। यह अवधि उन्हीं पचास दिनों की थी जिसमें प्रधानमंत्री ने स्थिति एकदम सामान्य हो जाने का भरोसा दिलाया था। तब तक हालात तो सामान्य नहीं हो पाए थे, उलटे एसबीआइ ने अपने खाताधारकों को राहत देने की रिजर्व बैंक की हिदायत पर अमल करना जरूरी नहीं समझा। सूचनाधिकार के तहत दी गई जानकारी से यह भी खुलासा हुआ है कि पिछले वित्तवर्ष की तीसरी तिमाही में (जिस दौरान नोटबंदी हुई) एसबीआइ ने पहली और दूसरी तिमाही से भी ज्यादा एटीएम शुल्क वसूला। अन्य बैंकों का व्यवहार क्या इससे अलग होगा? यह भी गौरतलब है कि एटीएम शुल्क के तौर पर बैंकों को होने वाली कमाई अमूमन गरीब और एकदम साधारण आय वाले लोग चुका रहे हैं, क्योंकि जिनके खातों में औसत मासिक जमा पच्चीस हजार रुपए से अधिक हो, वे बिना किसी शुल्क के, चाहे जितनी बार निकासी या लेन-देन कर सकते हैं।

एटीएम की तरह चेकबुक इस्तेमाल करना भी पहले से महंगा हो गया है। नोटबंदी के बाद गैर-नकदी लेन-देन को जो प्रोत्साहित किया गया, क्या उसका मकसद सरकार, वित्तीय लेन-देन की तकनीक (फिनटेक) मुहैया कराने वाली कंपनियों और बैंकों के लिए राजस्व के नए दरवाजे खोलना था? नोटबंदी के बाद से, मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं से लेकर निर्यात तक, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में सुस्ती का ही आलम रहा है। रोजगार देने के वादे की दिशा में तो कुछ नहीं हुआ, उलटे लाखों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है। जाहिर है, कमाई के अवसर तो नहीं बढ़े, पर अपना ही पैसा निकालने और भेजने पर शुल्क जरूर बढ़ गए। क्या यह एक कल्याणकारी राज्य का लक्षण है?

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