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अस्मिता की रस्साकशी

गोरखालैंड की मांग को लेकर इस इलाके में अनिश्चितकालीन बंदी जारी है। स्कूल-कॉलेज, कार्यालय और बाजार बंद हैं। इंटरनेट सेवाएं ठप हैं।

बंगाल के दार्जीलिंग क्षेत्र को तनाव की आंच में तपते करीब एक पखवाड़ा हो गया। हफ्ते भर से तो हालात और विकट हो गए हैं। गोरखालैंड की मांग को लेकर इस इलाके में अनिश्चितकालीन बंदी जारी है। स्कूल-कॉलेज, कार्यालय और बाजार बंद हैं। इंटरनेट सेवाएं ठप हैं। इस स्थिति का अभी तक अंत होता नहीं दिख रहा तो इसकी प्रमुख वजह यही है कि सभी प्रमुख पक्ष इस तनाव की आंच में अपनी सियासी रोटियां सेंकना चाहते हैं। दार्जीलिंग गोरखा-बहुल क्षेत्र है। दार्जीलिंग में जनाधार रखने वाले स्थानीय दलों और संगठनों को जहां यह अलग राज्य की मांग के लिए दबाव बनाने का माकूल मौका नजर आता है, वहीं ममता बनर्जी उनके प्रति सख्ती दिखा कर बाकी पूरे बंगाल में अपना आधार और पुख्ता करना तथा भाजपा की उलझन बढ़ाना चाहती हैं। इसमें दो राय नहीं कि गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जीजेएम) की अगुआई में चल रहे आंदोलन को दार्जीलिंग क्षेत्र में व्यापक जन-समर्थन प्राप्त है। गोरखा लीग, गोरखा लिबरेशन फ्रंट, जन आंदोलन पार्टी जैसे अन्य गोरखा दलों के अलावा यहां के स्वयंसेवी संगठन भी आंदोलन में कूद पड़े हैं। और पिछले कुछ दिनों से तो महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया है। लेकिन अलग गोरखालैंड की मांग क्यों, जबकि गोरखा लोगों के लिए एक स्वायत्त व्यवस्था बनी हुई है?

राज्य सरकार का एक फरमान दार्जीलिंग में अशांति की वजह बना। राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर बंगाल के सभी स्कूलों में बांग्ला की पढ़ाई अनिवार्य कर दी। नेपाली बोलने वाले गोरखा लोगों को यह आदेश नागवार गुजरा और वे सड़कों पर उतर आए। लेकिन जब राज्य सरकार ने साफ कर दिया कि बांग्ला की अनिवार्य पढ़ाई का आदेश दार्जीलिंग क्षेत्र में लागू नहीं होगा, तो विरोध शांत हो जाना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ, बल्कि विरोध-प्रदर्शन फिर अलग राज्य की मांग को लेकर होने लगे। अस्सी के दशक में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखालैंड के लिए उग्र आंदोलन चला था। आखिरकार समाधान यह निकला कि गोरखा लोगों को कुछ मामलों में स्वायत्तता दी जाए। जीटीए यानी गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन इसी की परिणति है, जिसके प्रतिनिधि प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने जाते हैं। बंगाल में अपना ठौर बनाने की कोशिश में भाजपा ने 2009 से ही गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से समझौता कर रखा है। मोर्चा के समर्थन के बल पर ही दार्जीलिंग से भाजपा दो बार लगातार अपना उम्मीदवार लोकसभा में भेज सकी। जीजेएम ने अपने गढ़ से भाजपा के प्रत्याशी को जिताना गवारा किया तो इसी उम्मीद में कि उसके एजेंडे को एक बड़ी पार्टी का सहारा मिलेगा। पिछले लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में भाजपा ने गोरखालैंड का सीधे जिक्र तो नहीं किया था, पर यह भरोसा जरूर दिलाया था कि सत्ता में आने पर गोरखा लोगों की मांगों पर वह सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी। तीन साल में उसने किस मांग पर सहानुभूति से विचार किया है?

अब भाजपा एक गहरे ऊहापोह में है। अगर वह गोरखालैंड की मांग के साथ खड़ी दिखेगी, तो बाकी सारे बंगाल में इससे नकारात्मक संदेश जाएगा। इसीलिए वह पुलिस फायरिंग का मुद््दा तो उठा रही है, पर गोरखालैंड की मांग पर चुप है। गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के साथ भाजपा के बरसों से चले आ रहे गठबंधन को देखते हुए ममता बनर्जी को भाजपा को घेरने का यह एक अच्छा मौका दिख रहा है। साथ ही वह भाजपा के हिंदुत्व कार्ड को बेअसर करने के लिए बंगाली अस्मिता का हथियार आजमाती प्रतीत होती हैं। जबकि दार्जीलिंग के स्थानीय लोगों के लिए यह गोरखा अस्मिता की लड़ाई है। लेकिन इस वक्त पहला तकाजा दार्जीलिंग में शांति कायम करने का है।

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