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मेट्रो की मार

आरटीआइ के तहत सामने आई एक जानकारी के मुताबिक मई में किराए में बढ़ोतरी के बाद मेट्रो से सफर करने वालों की संख्या में रोजाना लगभग डेढ़ लाख लोगों की कमी आई।
Author October 12, 2017 05:44 am
इस भर्ती में इच्छुक और इन पदों के लिए योग्य उम्मीदवार दिल्ली मेट्रो रेल की आधिकारिक वेबसाइट www.delhimetrorail.com के जरिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

किसी भी शहर में यातायात और पर्यावरण को सहजने के लिए सबसे जरूरी है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन डीएमआरसी यानी दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोशन ने अगर मई से लेकर अब तक दूसरी बार किराए में बढ़ोतरी की है, तो इसका सामान्य जनता से लेकर सड़क तक पर क्या असर पड़ेगा! हालांकि पिछले कुछ दिनों के दौरान दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार और डीएमआरसी के बीच इस बात को लेकर काफी जद्दोजहद हुई कि किराए में बढ़ोतरी नहीं की जाए। लेकिन अगर यह तथ्य सही है कि मेट्रो किराया निर्धारण समिति में दिल्ली सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल थे और ताजा फैसले में उनकी भी सहमति थी, तो अब इस विरोध के क्या मायने हैं! बहरहाल, ताजा बढ़ोतरी महज दस रुपए की है, लेकिन अगर मई महीने में इसका खयाल रखा गया होता तो ज्यादातर लोगों को इससे बहुत आपत्ति नहीं होती। लेकिन तब पहले तीस रुपए अधिकतम को बढ़ा कर पचास रुपए किया गया, फिर अब उसे साठ रुपए कर दिया गया। सौ फीसद की यह वृद्धि नए स्लैब निर्धारण में कहीं-कहीं और ज्यादा हो जाती है।

पिछले कुछ समय से डीएमआरसी ने कर्मचारियों के वेतन, रखरखाव और दूसरी सुविधाओं में बढ़ोतरी के लिए खर्च जुटाने की दलील के साथ घाटा होने की बात भी करनी शुरू कर दी थी। जबकि कुछ समय पहले तक दिल्ली मेट्रो लगातार मुनाफे का दावा करती रही थी। हर अगले आंकड़े में यात्रियों की बढ़ोतरी के अलावा मेट्रो परिसरों के व्यापक पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल से होने वाली आमदनी जगजाहिर रही है। इसलिए घाटे की दलील पर किराए में इतनी बड़ी बढ़ोतरी की दलील से सहमत हो पाना मुश्किल है। यों भी सवाल है कि एक बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन सेवा देने का दावा करने वाली दिल्ली मेट्रो के लिए उसके उपभोक्ता प्राथमिक हैं या फिर मुनाफा! इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली परिवहन की गैर-भरोसेमंद सेवाओं के बरक्स आज दिल्ली में मेट्रो सार्वजनिक परिवहन की रीढ़ बन चुकी है। ऐसा संभव हो सका तो इसलिए कि मेट्रो का सफर आरामदेह और किराया लोगों की पहुंच में था और न्यायपूर्ण लगता था। यही वजह थी कि हर नए आंकड़े में मेट्रो से सफर करने वालों की तादाद में भारी बढ़ोतरी हो रही थी।

पर आज हालत यह है कि बढ़ाए गए किराए की वजह से बड़ी तादाद में लोग मेट्रो से आवाजाही के दायरे से बाहर हो गए हैं। आरटीआइ के तहत सामने आई एक जानकारी के मुताबिक मई में किराए में बढ़ोतरी के बाद मेट्रो से सफर करने वालों की संख्या में रोजाना लगभग डेढ़ लाख लोगों की कमी आई। ताजा वृद्धि के बाद यह संख्या और बढ़ने की आशंका है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर लोग मेट्रो तक पहुंच से बाहर हो गए हैं। आखिर सार्वजनिक परिवहन के एक सुविधाजनक साधन के रूप में मेट्रो जहां सबके लिए सुलभ रही, अब वह खुद को समाज के किस तबके के दायरे में समेटना चाहती है? ऐसे फैसलों से पर्यावरण के नुकसान और सड़कों पर वाहनों के बोझ को कितना कम किया जा सकेगा? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सुलभ, सस्ता और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन किसी शहर को सुव्यवस्थित बनाए रखने में सबसे ज्यादा मददगार साबित हो सकते हैं। इसका खमियाजा व्यस्त समय में ठहरी हुई सड़कों के रूप में देखा जा सकता है, जो आज दिल्ली की पहचान बन चुकी है।

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