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संपादकीय: हादसे की पटरी

देश की ज्यादातर रेल लाइनें खुली हुई हैं, जिन्हें पैदल पार कर स्थानीय लोग इधर से उधर आते-जाते हैं, वहां चरते हुए मवेशी पहुंच जाते हैं। ग्रामीण इलाकों से गुजरती पटरियों की तो दूर, शहरी इलाकों में भी ऐसी किसी सुरक्षा की जरूरत नहीं समझी जाती।

Author August 10, 2018 1:51 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Express Photo)

रेल की पटरियों पर मवेशियों या फिर जंगली जानवरों के पहुंच जाने और गाड़ी से टकरा कर मारे जाने की घटनाएं अक्सर हो जाती हैं। बिना फाटक वाली जगहों से गुजरते वाहनों के रेल गाड़ियों से टकराने से होने वाले हादसों में भी कमी दर्ज नहीं हो पा रही। इस तरफ लंबे समय से ध्यान दिलाया जाता रहा है कि रेल लाइनों पर लोगों, मवेशियों या फिर जंगली जानवरों की पहुंच को रोकने का इंतजाम होना चाहिए, मगर इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यही वजह है कि दिल्ली के नरेला इलाके में रेल की पटरियों पर पहुंच गई बीस गायों ने तेज रफ्तार कालका शताब्दी एक्सप्रेस की चपेट में आकर दम तोड़ दिया। इसके चलते रेल यातायात भी बाधित हुआ। यह हादसा दिल्ली के एक इलाके में हुआ, जहां तेज रफ्तार रेल गाड़ियों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। बताया जा रहा है कि चरवाहों ने अचानक गायों को हांक कर रेल लाइन पार कराने की कोशिश की, जिस दौरान यह घटना हुई। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब दिल्ली जैसी जगहों की व्यस्ततम रेल लाइनों पर यह हाल है, तो उन पटरियों पर क्या होता होगा, जहां गाड़ियों की आवाजाही अपेक्षाकृत कम है।

ऐसे हादसे जंगली इलाकों से गुजरने वाली रेल लाइनों पर अक्सर हो जाते हैं, जब जंगली हाथी या दूसरे जानवर पहुंच जाते हैं और तेज रफ्तार गाड़ियों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं। उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा आदि राज्यों में रेलों से टकरा कर जंगली जानवरों के मारे जाने की खबरें जब-तब आती रहती हैं। बहुत पहले से रेल बजट में इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि भीड़भाड़ वाली जगहों, शहरी इलाकों और गांवों के आसपास की रेल लाइनों के दोनों तरफ लोहे की मजबूत बाड़ लगाई जाएगी, ताकि पटरियों पर आकर मवेशी, जंगली जानवर या फिर लोग गाड़ियों से न टकराने पाएं। मगर हकीकत यह है कि देश की ज्यादातर रेल लाइनें खुली हुई हैं, जिन्हें पैदल पार कर स्थानीय लोग इधर से उधर आते-जाते हैं, वहां चरते हुए मवेशी पहुंच जाते हैं। ग्रामीण इलाकों से गुजरती पटरियों की तो दूर, शहरी इलाकों में भी ऐसी किसी सुरक्षा की जरूरत नहीं समझी जाती। यह काम अगर कुछ खर्चीला हो भी, तो यह लोगों, दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीवों, मवेशियों और रेल संपत्ति को पहुंचने वाले नुकसान की तुलना में कम ही होगा।

हालांकि यह भी देखा जाता है कि शहरी इलाकों में जहां रेल लाइनों के किनारे लोहे की बाड़ लगी है, वहां लोग अपनी सुविधा के अनुसार आने-जाने की जगह बना लेते हैं। यहां तक कि रेलवे स्टेशनों पर लोग पुल के बजाय पटरियों से गुजरते हुए एक से दूसरे प्लेटफार्म पर जाते देखे जाते हैं। मगर इस तर्क पर सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। दिल्ली के पास की व्यस्ततम रेल लाइन पर जब गायों का झुंड पहुंच जाता है, तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां कैसी सुरक्षा व्यवस्था रही होगी। पटरियों पर किसी दूसरे तरह की आवाजाही संभव न हो सके, इसके लिए रेल महकमा जिम्मेदार होता है। अगर भीड़भाड़ वाली जगहों, ग्रामीण इलाकों, जंगली क्षेत्रों से गुजरने वाली पटरियों पर ठीक से बाड़ लगाई जाती, निगरानी रखी जाती, नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ाई से पेश आया जाता, तो ये हादसे होने ही न पाते।

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